हृदय से जीना

आचार्य प्रशांत: यदि प्राणी हृदय से संचालित है तो वो वास्तव में परम स्रोत से ही संचालित है; पर ये शर्त बड़ी है कि उसे हृदय से संचालित होना चाहिए। जब वह हृदय से संचालित होता है तो इन्द्रियाँ वैसी हो जाती हैं जैसी श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, कि, ‘निर्मल इन्द्रिय’। फिर इन्द्रियाँ भी अपने उन विकारों को और सीमाओं को त्याग देती हैं जिनके कारण जीव भ्रम में पड़ा रहता है इंद्रियों पर चलकर के; फिर बाहर भी नाना प्रकार की वस्तुएँ, संसार, माया ये नहीं दिखाई देते, ठीक वही…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org