हिम्मत की सुनोगे या डर की?

हिम्मत के पास हमेशा एक तर्क होता है और डर के पास भी हमेशा एक तर्क होता है, जिसका तर्क जीतता है, वो जीत जाता है।

डर से जब कहते हो मुक्ति चाहिए तो यही कह रहे हो कि जैसी जिंदगी चल रही है, वैसी नहीं चाहिए।

डर क्या है, तुम्हारी जीती-जागती हकीकत या कोई किताबी सिद्धांत?
अगर जीवन डर से इतना लिप्त है तो जीवन बढ़िया कैसे है?

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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