हम पशुओं को क्यों मारते हैं?

इंसान का अहंकार है कि जैसा मैं हूँ, वही ठीक है और सबको मेरे जैसा होना पड़ेगा। आदमी के अंदर अहंकार बहुत गहरा है और जो कोई हमारे जैसा नहीं है, उसको हम कैसा समझते हैं — तुच्छ! उसको हम कह देते हैं कि ये तो नालायक है। अब आदिवासी कम कपड़े पहनता है तो हम कह देते हैं कि ये असभ्य है और जानवर तो बेचारा एकदम ही कपड़े नहीं पहनता, तो उसको हम क्या बोल देते हैं? कि ये तो बिलकुल ही जानवर है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org