हम डरते क्यों हैं?

डर करने में नहीं, डर करने के विषय में सोचने में है। जब कर्म हो रहा होता है, जब आप गहराई से करने में ही उतरे होते हैं, तब डर महसूस नहीं हो रहा होता है।

हम में से ज़्यादातर लोगों को भ्रम यही है कि मुझे ये काम करने में डर लगता है। “मुझे बोलने में डर लगता है, मुझे कहीं जाने में डर लगता है, मुझे कुछ लिखने से डर लगता है।”

याद रखिएगा, डर ना बोलने में है, ना कहीं जाने में, और ना ही लिखने में। डर है उस विषय के…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org