हमारी खुशियाँ दूसरों पर निर्भर क्यों?

तुम्हें दुनिया से जाकर के अनुमति लेने की जरुरत नहीं है कि ‘मैं कुछ हूँ या नही हूँ’। एक ठसक रखो अपने भीतर कि ‘जैसे भी हैं, बहुत बढ़िया हैं’। मैं अहंकार की बात नही कर रहा हूँ। मैं इस श्रद्धा की बात कर रहा हूँ कि ‘अस्तित्व मेरा हक है’, कि ‘यदि हूँ तो छोटा या बुरा या निंदनीय नही हो सकता’। दुनिया में कुछ भी ऐसा है जो है तो पर उसे होना नही चाहिये था? दुनिया में कुछ भी ऐसा है क्या? कुछ भी ऐसा दिखा दो — छोटे से छोटा घास का तिनका भी ऐसा है क्या जो है तो पर उसे होना नहीं चाहिये था? है? जो भी कुछ है वो अपनी जगह पर पूरा है और ठीक है। वो कुछ बन के ठीक नहीं होगा, वो ठीक है। वो कुछ हासिल कर के जीने काबिल नहीं बनेगा, उसके होने में ही उसकी पात्रता है।

इंसान अकेला है जिसे ये लगता है कि वो ठीक नहीं है। अपने भीतर से ये भाव निकल दो कि ‘मैं ठीक नहीं हूँ’। ये हीनभावना हमारे भीतर बहुत गहरी गयी है। हम बड़ा छोटा अनुभव करते हैं, डरे-डरे रहते हैं। जब सब कुछ अपनी जगह पर है और उसमे स्थित है तो ये संभव कैसे है कि तुममें ही कोई खोट होगी, बताओ मुझे? सूरज अपनी जगह पर है, मिट्टी अपनी जगह पर है, छोटे-मोटे कीड़े भी अपनी जगह पर हैं, और खुश हैं, और कोई अड़चन नहीं है और कोई अव्यवस्था भी नहीं है, आउट ऑफ़ प्लेस कुछ भी नहीं है, तो तुम ही कैसे हो सकते हो? तुम सुंदर पक्षियों की तो बात करते हो; कहते हो ‘बड़े सुंदर हैं, बड़े सुंदर हैं’, सुंदर जानवरों की बात करते हो, पर जिनको तुम सुंदर नहीं भी कहते — मान लो कोई घिनौना सा कीड़ा है– होते हैं ना कई जिनको देख कर के ही उकताहट लगती है? वो हमारी दृष्टि है कि हम किसी को सुंदर बोलते हैं, किसी को कुरूप बोलते हैं। कोई गन्दा-सा लिजलिजा-सा कीड़ा है — क्या उसके भीतर भी ये हीनता होती है कि ‘मैं कुछ और बन जाऊँ’? होती है क्या? वो मिट्टी में पड़ा रहता है और तब भी मरा नही जा रहा तनाव में कि ‘क्या यार, ज़िन्दगी में कुछ हासिल नहीं किया और ये क्या रूपरंग है — गन्दा’, पर तुम हो जिसे अपना रूपरंग बदलने की बड़ी ज़रुरत है। तुम हो जिसे अपना व्यवहार, अपना मन बदलने की बहुत ज़रुरत है। तुम हो जिसे ज़िन्दगी में तरक्की की और हासिलियत की बहुत ज़रूरत है।

जो भी कोई इस खेल में पड़ेगा वो धोखे ही धोखे खायेगा, और इस बात से डर मत जाओ, प्रभावित मत हो जाओ कि पूरी दुनिया ऐसे कर रही है तो यही तो सही होगा। तुम्हें क्या पड़ी है संख्या गिनने की, तुम्हें क्या पड़ी है ये देखने की कि सब लोग क्या कर रहे हैं। तुम्हें कितनी ज़िंदगियाँ जीनी हैं: अपनी या सब की? तुम ये देखो ना कि तुम्हारे लिये क्या उचित है। तुम्हारी एक ज़िन्दगी– तुम उसके लिये देखो क्या उचित है। या तुम इसी ढ़र्रे में पड़े रहोगे कि सब करते हैं तो ठीक ही होगा?

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org