स्वीकृति की चाह और नियन्त्रण का भाव

प्रश्न: स्वीकृति, मान्यता हमारे लिए इतना महत्व क्यों रखती है? जब कोई नहीं होता तो हम खुद अपनेआप को अपनी स्वीकृति देने लगते हैं।

आचार्य प्रशांत: स्वीकृति से, मान्यता से नियंत्रण का भाव आता है। जो हो रहा है वो मेरे चाहे हो रहा है। मैं पूरे नियंत्रण में हूँ। नहीं मैं बह नहीं रहा हूँ, मैं तो अपेक्षित दिशा में ही जा रहा हूँ। मेरी नाव हवाओं के साथ नहीं है, मेरी नाव मेरी मर्ज़ी के साथ है। आप देखिएगा वही घटना…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org