स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण का कारण

इतना भी अचानक नहीं हो जाता, सोचा-समझा निर्णय होता है।

माना कि काम बेहोशी में होता है, पर पूरे बेहोश नहीं होते तुम।

सहमति तो तुम्हारी होती है, कि — “चीज़ मज़ेदार है, मौका कौन चूके।” या एकदम यकायक हो जाता है, कि — “हम क्या करें? हो गया”? बात सीधी है — मज़ा आता है। बात इतनी सीधी है कि इसमें मैं समझाऊँ भी क्या। नहीं है? सेब खाते हो, मज़ा आता है ज़ुबान को। कोई मालिश करे, मज़ा आता है पीठ…

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org