स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण का कारण

इतना भी अचानक नहीं हो जाता, सोचा-समझा निर्णय होता है।

माना कि काम बेहोशी में होता है, पर पूरे बेहोश नहीं होते तुम।

सहमति तो तुम्हारी होती है, कि — “चीज़ मज़ेदार है, मौका कौन चूके।” या एकदम यकायक हो जाता है, कि — “हम क्या करें? हो गया”? बात सीधी है — मज़ा आता है। बात इतनी सीधी है कि इसमें मैं समझाऊँ भी क्या। नहीं है? सेब खाते हो, मज़ा आता है ज़ुबान को। कोई मालिश करे, मज़ा आता है पीठ को। वैसे जननांग होते हैं, उन्हें यौन सुख चाहिए। इसमें लोग जिज्ञासा करते क्यों हैं, मैं तो ये नहीं जान पाता।

पुरुष जननांग है, स्त्री जननांग है, दोनों एक-दूसरे की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी को तुम बोलते हो ‘आकर्षण’। और क्या है? इसमें छुपा हुआ क्या है। इसमें क्या ऐसा है जो ख़ुफ़िया है? कुछ नहीं। बात शारीरिक है पूरी, और रासायनिक है पूरी।

तुम्हारे शरीर के भीतर कुछ रसायन हैं, स्त्री के शरीर के भीतर कुछ दूसरे रसायन हैं, वो हैं ही इस तरीक़े के कि एक दूसरे की ओर खिचेंगे। इसमें क्या पूछते हो कि — “मैं स्त्री की ओर क्यों खिंचता हूँ?” क्योंकि हॉर्मोन (रसायन) है इसलिए। लेकिन याद रखना, हॉर्मोन मालिक नहीं होते, हॉर्मोन को भी इजाज़त तुम देते हो। और इजाज़त तो छोड़ दो, कई बार तो उन हॉर्मोन्स को भड़काते भी तुम हो।

हॉर्मोन बेचारा चुपचाप भी बैठा होगा, तो तुम उसे घिस-घिस कर उत्तेजित करोगे, कि — “उठ, जाग, दर्दे दिल जाग।”

इसमें कोई मिस्ट्री (रहस्य) नहीं है। कृपा करके इसको कोई रहस्यवादी आयाम मत दीजिए। स्त्री-पुरुष आकर्षण में कोई रहस्यवाद नहीं है, कोई मिस्टिसिस्म नहीं है। पूरी प्रकृति में यही चल रहा है — नर-मादा, नर -मादा, नर-मादा। इसमें क्या रहस्य है?

‘प्रकृति’ का मतलब है — प्रजाति आगे बढ़नी चाहिए। नर-मादा आकर्षित होते रहते हैं, ताकि बच्चे पैदा हों, प्रजाति आगे बढ़े। प्रकृति का बन्दोबस्त है, इसीलिए उसने तुम्हारे शरीर में हॉर्मोन छोड़े हैं, ताकि प्रजाति आगे बढ़ती रहे। नहीं तो प्रजाति ही विलुप्त हो जाएगी।

ये प्रकृति का चाहना है — तुम कैसे भी रहो, प्रजाति आगे बढ़नी चाहिए। बल्कि जो जितना गया-गुज़रा होता है, वो उतना प्रजाति को आगे बढ़ाता है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org