स्त्री का विकास, परंपरा, और आधुनिकता

पहली बात तो ये है कि नारी विमर्श में आज पुरानी नारी को जितनी दयनीय हालत में दर्शाया जाता है उतनी दयनीय हालत में वो थी नहीं। निश्चित रूप से उसका शोषण भी होता था, निश्चित रूप से उसके अधिकार भी कुछ कम थे, निश्चित रूप से उस पर कुछ वर्जनाएं थीं, पर जितना आधुनिक विमर्श में उसको बेचारगी की हालत में दिखाया जाता है उतनी बेचारगी की हालत में वो कभी नहीं थी।

आप पुराने ग्रंथों को देखें, आप कहानियों को देखें, जो उस समय के समाज का खाता आपके सामने खींचती हो, प्रतिबिंबित करती हों, उसमें आपको दिखाई देगा कि महिलाओं के भी अपने पुख़्ता हक थे, और बहुत मज़बूत महिलाएं भी हुआ करती थीं। ऐसा ही नहीं था कि वो बेचारी बस दमित ही थीं और और पुरुष वर्ग उनका लगातार शोषण ही करे जा रहा था। ये तो हमने कहानी को पूरा पोत दिया एक काले रंग से। दीवार पर कई रंग थे, पर चूंकि हमें ये दिखाना था कि हम सफेद हैं, तो हमने उस पुरानी दीवार को पूरा ही काला पोत दिया। जब जिसका तुम विरोध कर रहे हो वो पूरा काला दिखाई देता है, तो तुम्हारी सफेदी में और रौनक आ जाती है न — “देखो, वो कितने काले थे, हम कितने सफेद हैं”। नहीं! स्त्री के विकास के लिए वास्तव में जो ज़रूरी है वो निश्चित रूप से होना चाहिए, पर ये ना कर दीजिएगा जिसे अंग्रेज़ी में कहते हैं — “थ्रोइंग द बेबी आउट विद द बाथ वॉटर”।

बहुत कुछ ऐसा भी था स्त्री में जो सम्माननीय था, अनुकरणीय था, और आधुनिकता के नाम पर स्त्री उसको खोती चली जा रही है। जो कमियाँ थीं उनको दूर करिए; जहाँ अन्याय था उसको हटाइए; जो कुप्रथाएं थीं उन्हें दरवाज़ा दिखाइए; पर ऐसा ना हो कि आप त्याग को, सहनशीलता को, क्षमा को, और प्रेम को ही पुरानी बातें समझ कर के, दखियानूसी बातें समझ कर के ख़ारिज कर दें — और यही हो रहा है।

नारी का पहले जिन-जिन तरीकों से शोषण हुआ, उन सब तरीकों की खिलाफत होनी बहुत ज़रूरी है, पर उस खिलाफत का अर्थ ये नहीं है कि नारी में जिन गुणों को पहले प्रोत्साहित किया जाता था, उन गुणों को भी व्यर्थ समझ कर के कचरे में डाल दिया जाए। सहनशीलता क्या बुराई है? अगर सहनशीलता बुराई है तो सब आधुनिक लोग सहिष्णुता उर्फ़ टॉलरेंस की क्यों बात करते हैं? धैर्य क्या बुराई है? तो अगर भारतीय परंपरा ने स्त्री में इन गुणों को पूजनीय माना, तो क्या आप उस पूरी परंपरा को ही अस्वीकार कर देना चाहते हो? नहीं साहब, अस्वीकार नहीं किया जाता, बेहतर बनाया जाता है। अतीत में बहुत कुछ है जो अच्छा है, सुंदर है, उसे ग्रहण करिए। आधुनिकता के नाम पर सब उठा कर मत फेंक दीजिए। और ऐसा भी नहीं है देखिए कि आधुनिकता के नाम पर आप सब कुछ फेंक देते हैं। आधुनिकता के नाम पर आप बस वो फेंक देते हैं जो ये तथाकथित आधुनिकतावादी और बुद्धिजीवी आपको फेंकना सिखाते हैं। आधुनिकता के नाम पर आप पचास चीज़े…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org