सोचो ज़रूर, पर सोचते ही मत रह जाओ

आचार्य प्रशांत: तुमने कहा कि अगर मैं यहां बैठा भी हूं, तो कुछ सोच रहा हूं; अतीत का। और मुझे लग रहा है कि यदि ऐसा ना किया होता, तो अभी जो होता है, अभी जो रहा है, वो थोड़ा अलग होता। है ना? तो तुम कह रहे हो कि अभी यहां होकर भी मन में विचार तो अतीत का ही चल रहा है। उसमें कोई दिक्कत ही नहीं है। नहीं, तुमसे ये नहीं कहा जा रहा है कि अतीत को लेकर मन में कोई विचार ना उठे।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org