साहब, नज़र रखना

साहब नज़र रखना, मौला नज़र रखना
तेरा करम सबको मिले, सबकी फ़िक्र रखना
न आदमी की आदमी झेले गुलामियाँ,
न आदमी से आदमी मांगे सलामियाँ
जो फ़र्क पैदा हो रहे, वो फ़र्क गर्क हों
सबको बराबर बाँट, ये धरती ये आसमान
कोई भी न हो दर्द में, सबकी ख़बर रखना

प्रश्न: सर, कृपया इस गाने का अर्थ बताईये।

उत्तर: भास्कर,

हमें लगातार लगता रहता है कि हमारे करे हो रहा है। हम खुद को डूअर – कर्ता – माने रहते हैं.ध्यान से देखें तो मन की दो स्थितियां हैं:

१. यांत्रिक- कंडीशन्ड। इस स्थिति में निश्चित रूप से हम कुछ नहीं कर रहे। जो कर रही है, हमारी प्रोग्रामिंग कर रही है.

२. बोधयुक्त – इंटेलिजेंट। इस स्थिति में भी हम कुछ नहीं कर रहे। जो हो रहा है, वो स्वतः हो रहा है।

इसलिए, समझने वालों ने कहा है कि हम कुछ नहीं करते, करने वाला कोई और है। चूंकि उसके होने से सब है, उसके करने से सारे कर्म हैँ, इसलिये उसे साहब कहा जाता है.

तुम्हारे गीत में साहब शब्द का प्रयोग बार-बार हुआ है। अब समझ रहे होगे।

साहब तेरी साहबी, सब घट रही समाय
ज्यों मेहँदी के पात्र में, लाली लखी न जाय ~ कबीर साहब

साहब, तू हर जगह इतना मौज़ूद है कि तुझे देख पाना ही मुश्किल है। जैसे कि मेहँदी के कटोरे में बता पाना मुश्किल है कि लाल रंग कहाँ है।

या फिर:

साहब से सब होत है, बन्दे से कुछ नाहीँ राई से परबत करे, परबत राई माहीं ~ कबीर साहब

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org