साहब, नज़र रखना

हमें लगातार लगता रहता है कि हमारे करे हो रहा है। हम खुद को डूअर — कर्ता — माने रहते हैं। ध्यान से देखें तो मन की दो स्थितियां हैं:

१. यांत्रिक- कंडीशन्ड। इस स्थिति में निश्चित रूप से हम कुछ नहीं कर रहे। जो कर रही है, हमारी प्रोग्रामिंग कर रही है।

२. बोधयुक्त — इंटेलिजेंट। इस स्थिति में भी हम कुछ नहीं कर रहे। जो हो रहा है, वो स्वतः हो रहा है।

इसलिए, समझने वालों ने कहा है कि हम कुछ नहीं करते, करने वाला कोई और है। चूंकि उसके होने से सब है, उसके करने से सारे कर्म हैं, इसलिये उसे साहब कहा जाता है।

कबीर साहब तेरी साहबी, सब घट रही समायज्यों मेहँदी के पात्र में, लाली लखी न जाय…

साहब, तू हर जगह इतना मौज़ूद है कि तुझे देख पाना ही मुश्किल है। जैसे कि मेहँदी के कटोरे में बता पाना मुश्किल है कि लाल रंग कहाँ है।

या फिर: साहब से सब होत है, बन्दे से कुछ नाहीँराई से परबत करे, परबत राई माहीं…

और: ना कुछ किया न कर सका, ना करने जोग शरीर जो कुछ किया साहिब किया, ताते भया कबीर…

फिर प्रश्न ये है, कि जब सब कुछ साहब को ही करना है, तब हमारे (अहम) के करने के लिये क्या शेष है?

हमें यही करना है कि समर्पित रहें, अहंकार को साहब के सामने रख दें, और फिर जो होता है, होने दें। अहंकार मन पर बोझ ही होता है, एक बार उसे साहब को सौंप दिया, फिर जीवन बड़ा हल्का, बड़ा मधुर, बड़ा सहज हो जाता है।

अब आते हैं तुम्हारी दूसरी बात पर, कि दुनिया में बच्चों के प्रति, असहायों के प्रति, जानवरों के प्रति, सभी के प्रति, इतनी क्रूरता क्यों है?

कारण स्पष्ट है: जब अहंकार साहब के सामने झुका नहीं होता, साहब से मिलकर गला नहीं होता, तब तक, अहंकार स्वयं को ही साहब मानता रहता है, और दुनिया को अपना गुलाम। अहंकार डरा-डरा रहता है, अपनी रक्षा के लिये चिंतित। दुनिया दुश्मन सी लगती है।

समझ ही गये होगे कि ऐसे डरे हुए चित्त से हिंसा और क्रूरता ही निकलेगी। जो खुद अभी अपनी रक्षा को लेकर आशंकित है, वो दूसरे की मदद नहीं करेगा। जिसे खुद ही अभी गरीबी सता रही है (‘मुझे और कमाना है’), वो कैसे खुले दिल से बाँट पायेगा?

अहम-वृत्ति से हिंसा निकलेगी ही निकलेगी।

आचार्य प्रशांत के विषय में जानने, और संस्था से लाभान्वित होने हेतु आपका स्वागत है

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

More from आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant