सारा जहाँ मस्त, मैं अकेला त्रस्त

मेरे पास लोग आते हैं। और कई बार धोखे से, ईमानदारी के किसी श्रण में कह ही जाते हैं कि आचार्य जी आपके पास आये, बड़ी संगत करी, बड़ी बातें सुनी, पालन भी किया, लेकिन वो सब नहीं मिला जो हमे चाहिए था। बड़ा दर्द रहता है लोगों के दिलों में। मैं पूछता हूँ कि इस बात के शुक्रगुजार नहीं हो तुम मेरे कि तुम्हे वह सब नहीं मिला जो तुम्हें चाहिए था? मेरा काम वह नहीं है जो तुम चाहते हो। तुम मुझे बस ये बता दो कि जैसे तुम थे पहले और जैसे तुम आज हो मेरे…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org