सर, बकरीद पर आप विरोध क्यों नहीं करते?

प्रश्नकर्ता: बकरीद आ रही है, और मैं उन संस्थाओं का समर्थन करता हूँ जो कि पी.सी.ए. एक्ट (अधिनियम) है, प्रीवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टुवर्ड्स एनिमल्स ( पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम- 1960), उसके सेक्शन अट्ठाईस को हटाने की माँग कर रहे हैं। उसका जो सेक्शन अट्ठाईस है वो कहता है कि किसी भी धार्मिक काम के लिए किसी भी पशु की, किसी भी तरीके से हत्या की जा सकती है, बलि दी जा सकती है, कुर्बानी दी जा सकती है। तो बहुत लोग और बहुत संस्थाएँ ये माँग कर रहे हैं कि ये जो सेक्शन अट्ठाईस है पी.सी.ए एक्ट का, इसको हटा दिया जाए, और अभी क्योंकि बकरीद सामने है तो इसलिए ये माँगें और ज़ोर पकड़ रही हैं। हालाँकि इस अधिनियम का संबंध किसी विशेष समुदाय, वर्ग या धर्म या मज़हब से नहीं है, तो फिर आप इसपर कुछ बोलते क्यों नहीं हैं? आप समर्थन क्यों नहीं दे रहे हैं कि, “हाँ, ये जो सेक्शन अट्ठाईस है, इसको हटाया जाए”?

आचार्य प्रशांत: मैं आता हूँ उसपर। पहले कुछ आँकड़े हैं जो आप सबके सामने रखने ज़रूरी हैं।

भारत में प्रतिवर्ष अस्सी लाख टन पशुओं का मांस तैयार किया जा रहा है, 1960 में ये दस लाख टन था। 1960 में भारत की आबादी पैंतालीस करोड़ थी, अभी एक सौ चालीस करोड़ है। आबादी बढ़ी है तीन गुना, और मांस का आहार बढ़ गया है आठ गुना, और खासतौर पर पिछले पंद्रह सालों में मांस के सेवन में ज़बरदस्त वृद्धि हुई है। भारत-भारत में लगभग पच्चीस करोड़ मुर्गे प्रतिवर्ष मारे जाते हैं, पंद्रह करोड़ बकरे मारे जाते हैं, और चालीस लाख करीब भैंस-भैंसे, इन सब की हत्या होती है। ये भारत के आँकड़े बता रहा हूँ, क्योंकि आप जिस अधिनियम की बात कर रहे हैं वो भारत का है। दुनिया के आँकड़े लें तो और ज़बरदस्त हैं। वास्तव में भारत दुनिया में प्रति व्यक्ति सबसे कम मांस खाने वाले देशों में है, लगभग पाँच किलो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष भारत में मांस खाया जा रहा है। और दुनिया में ऐसे भी देश हैं जहाँ सौ किलो से ज़्यादा, डेढ़ सौ किलो से ज़्यादा मांस खाया जा रहा है प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष। तो ये एक तस्वीर है जो पूरे साल का यथार्थ दर्शाती है। बकरीद एक दिन है, पूरे साल हम क्या कर रहे हैं? मैं पहले उस पर बात करूँगा, और फिर मैं बकरीद पर, धर्म पर और कुर्बानी पर आऊँगा।

तो भारत, जो अहिंसा का, करुणा का देश है वहाँ पर ये हाल है कि इतने करोड़ जानवर हर साल काटे जा रहे हैं। और जो भैंस का मांस है उसके निर्यात में भारत दुनिया में नंबर एक पर है, जो बकरे का मांस है उसके निर्यात में भारत दुनिया में नंबर दो पर है; ये भारत की स्थिति है, और ये काम साल-भर चल रहा है। जानवर साल-भर काटे जा रहे हैं, और जानवरों को खाने की और काटने की जो गति है वो बढ़ती ही जा रही है, बढ़ती ही जा रही है, और जानवरों को खाने वाले लोग किसी एक धर्म या मज़हब से संबंध नहीं रख रहे।

अभी हालत ये है कि सत्तर प्रतिशत से ज़्यादा भारतीय साल में कभी-न-कभी मांस ज़रूर खाते हैं। जो अपने-आपको शाकाहारी…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org