समाज नहीं, सामाजिकता है रोग

एक मुक्ति होती है कि मुझे किसी एक समाज से मुक्ति चाहिए। वह तब चाहिए होती है जब समाज आपकी रुचि का नहीं होता। मेरा जैसा मन है उससे वो समाज मेल नहीं खा रहा, तो मैं कहता हूँ कि मुझे इस समाज से मुक्ति चहिये। एक ऐसी मुक्ति होती है जो किसी ख़ास समाज से नहीं, समाज से ही मुक्ति चाहिए होती है। वहाँ आप यह नहीं कह रहे हैं कि यह समाज नहीं, कोई दूसरा समाज। क्योंकि अगर आप यह कह रहे हो कि यह समाज नहीं कोई दूसरा समाज, तो आपके मन में भूख बाकी है, सामाजिक होने की इच्छा अभी बाकी है। हाँ, एक विशिष्ट प्रकार का समाज आपको भाता नहीं है और एक दूसरे विशिष्ट प्रकार का समाज है जो आपको भाता है, पर इच्छा तो पूरी ही बनी हुई है। यह वैसा है जैसे की मन अभी भी किसी भी प्रकार की भूख में जी रहा है, बस भोजन का प्रकार बदलना है। तो यह वाला समाज नहीं, एक दूसरे प्रकार का समाज चहिये।

तो एक हुई ‘फ्रीडम फ्रॉम अ सोसाइटी’ और दूसरी हुई ‘फ्रीडम फ्रॉम सोसाइटी इटसेल्फ’। तो यह जो दूसरी है, यह बड़ी ख़ास बात है और कहीं-कहीं देखी जाती है। पहले वाली मुक्ति चाहने वाले बहुत लोग मिल जाएंगे। अगर आपको अपने घर-परिवार वाले लोग ही नहीं अच्छे लगते, तो वह भी एक प्रकार के समाज से विद्रोह ही है। घर एक प्रकार का छोटा-सा समाज है। तो पहले प्रकार की कामना तो करीब-करीब सब में मिल जाएगी। जो दूसरी बात है कि, मुझे समाज से ही मुक्ति चाहिए, यह बात दूर तक जाती है। वह हमें नहीं चाहिए होती है।

आप अगर गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि जिन्हें मुक्ति चाहिए होती है, उन्हें मुक्ति नहीं चाहिए, उन्हें बस एक वस्तु विशेष से दूर होना है। दोनों बातों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। मुक्ति मन की एक अवस्था है और वस्तु विशेष से दूर होना उस वस्तु पर निर्भर करता है। बहुत हो गया, ‘माई फ्रीडम’। आप यही कहते हो कि स्थितियाँ बदल जाएँ, पर किसी दूसरी प्रकार की स्थिति से आपका मन लगा हुआ है। आपको एक प्रकार का मनोरंजन अच्छा नहीं लगता है तो आप दूसरे प्रकार के मनोरंजन की तरफ चले जाते हो, पर मन है अभी भी वस्तु-केंद्रित। मनोरंजन के प्रकार बहुत अलग-अलग दिख सकते हैं पर है सब एक ही। आप पहले अपने आपको थोड़ा ज़्यादा संसारी बोलते थे तो आप मूवी देखने चले जाते थे, नाचने चले जाते थे, तो मनोरंजन था। और अब आप क्या कर सकते हो?

प्रश्नकर्ता: अकेले बैठ सकते हो।

आचार्य प्रशांत: अकेले बैठ सकते हो। अपने विचारों के साथ मस्त रह सकते हो, या फूल-पौधे हैं, या कोई छोटा बच्चा है या खेल कूद है। देखने में ऐसा लगेगा की इसकी ज़िन्दगी बदल गयी है। पहले तो यह हर दिन नाचता नज़र आता था और अब यह प्रकृति के करीब रहता नज़र आता है। वास्तव में कुछ बदला नहीं है बस इतना हुआ है की एक गतिविधि से उठ कर, दूसरे में संलग्न हो गए हो। कुछ बदला नहीं है क्योंकि मन वही है वस्तु…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org