समझो तो कि चाहिए क्या

प्रश्नकर्ता (प्र): आचार्य जी, जब सत्य या चेतना चुनाव करते हैं तो विवेक क्या है? चेतना और सत्य क्या भिन्न हैं? जब हम अध्यात्म की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं, तो क्या विवेक ही नहीं है जो बढ़ता है? जहाँ अभी तक समझ में आया है तो ऐसा प्रतीत होता है कि विवेक या बुद्धि तो प्रकृति है, तो विवेक बढ़ने से सत्य का चुनाव कैसे प्रभावित होता है? कृपया समझाएँ।

आचार्य प्रशांत (आचार्य): हमारी चेतना अशुद्ध चेतना होती है, उसका लक्ष्य होता है ‘सत्य’।…

--

--

--

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

Love podcasts or audiobooks? Learn on the go with our new app.

Get the Medium app

A button that says 'Download on the App Store', and if clicked it will lead you to the iOS App store
A button that says 'Get it on, Google Play', and if clicked it will lead you to the Google Play store
आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

More from Medium

The role of decluttering in mindfulness

Five habits that brought me out of a mental health funk.

Look for the Evidence: 3 ways to know #YouAreGuided

CODA & The Passage of Time