समझे जाने की इच्छा कहीं सम्मान पाने की इच्छा तो नहीं?

किसी को कुछ देना, किसी को कुछ समझाना, बड़ी ही ज़िम्मेदारी की बात होती है। जो किसी को कुछ देने निकले, कुछ समझाने निकले, उसे सर्व-प्रथम अपनी छोटी-छोटी चिंताओं से और फिक्रों से मुक्त होना पड़ेगा। जो अभी इसी उधेड़-बुन में लगा हुआ है कि मेरा क्या होगा। वो अभी किसी और को कुछ दे नहीं पाएगा।

दे पाने की पात्रता आपकी पूर्णता से शुरू होती है।

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org