सपने से बाहर आओ, स्वयं का अवलोकन करो

सपने से बाहर आओ, स्वयं का अवलोकन करो

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगरूढ़ हो जाने पर उस योगरूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पो का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है।

— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक ३

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। इस श्लोक में ‘योग में आरूढ़ होने की इच्छा’ से क्या तात्पर्य है? क्योंकि इस अध्याय के पहले ही श्लोक में तो कर्मफल की इच्छा से मुक्त होने को ही योग कहा गया है, फ़िर किस इच्छा का वर्णन श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में किया है? कृपया समझाने की कृपा करें।

आचार्य प्रशांत: बाकी सब इच्छाएँ एक तल पर हैं और कृष्ण की इच्छा दूसरे तल पर है। सर्वसंकल्पों का अभाव होना चाहिए तभी एक मात्र संकल्प बचेगा ‘कृष्ण-संकल्प’। सब संकल्पों को छोड़ना और कृष्ण-संकल्प को धारण करना, यह दोनों बिलकुल एक ही बात हैं; इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। सबको छोड़कर एक दिशा जाना है, वह दिशा संसार की नहीं है, वह दिशा ऊपर की है। या तो उसे कह दो कि वह दिशा ऊपर की है या कह दो कि भीतर की है, दोनों एक ही बात हैं।

संसार की दिशाएँ चारों तरफ पसरी होती हैं। भक्तिमार्गियों ने कहा कि यह चारों तरफ की दसों दिशाएँ हैं, इनकी तरफ नहीं जाना — ग्याहरवीं दिशा की ओर जाना है। भक्ति मार्ग पर चलोगे तो ग्याहरवीं दिशा ऊपर की ओर है, ज्ञान मार्ग पर चलोगे तो ग्याहरवीं दिशा भीतर की ओर है। पर बात यह है कि जाना ग्याहरवीं दिशा में ही है। संसार की अगर दस दिशा मानो तो उनमें नहीं जाना है; संसार में किसी दिशा में नहीं जाना है।

अब कहोगे कि “जीना तो संसार में ही है, ऐसा कैसे करें कि संसार में किसी दिशा ना जाएँ?” तो उत्तर यह है कि संसार में उस दिशा जाओ जिस दिशा जाने से ग्याहरवीं दिशा जाने में मदद मिलती हो।

अगर संसार में ही गति करनी है तो संसार में उसकी तरफ गति करो जो तुमको या तो तुम्हारे भीतर पहुँचा देगा या आकाश पहुँचा देगा।

प्र२: आचार्य जी, कल से सुनता आ रहा हूँ और आज भी बहुत अवलोकन करने के बाद एक चीज़ समझ में आ रही है, वह आपसे पूछना चाह रहा हूँ। आपने बोला कि सारे बन्धनों को छोड़ दो, तोड़ने का प्रयास करो, उसके बाद कृष्ण की प्राप्ति है। तो मेरा सवाल यह है कि मैं सर्वप्रथम अपने सारे बन्धनों का अवलोकन करूँ, उन्हें तोड़ने का प्रयास करूँ और उसके बाद जो भी करूँगा, वह सही होगा?

आचार्य: बन्धनों का अवलोकन नहीं करो, जीवन का अवलोकन करो तो समझ में आएगा कि बंधन कितने हैं। तुम्हें पता ही…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org