सन्यास- मूर्खता का प्रतिरोध

नारि पुरुष की इसतरी, पुरुष नारि का पूत।
याही ज्ञान विचारि के, छाडि चले अवधूत।।

~ संत कबीर

आचार्य प्रशांत: अवधूत शब्द ही गहरा है; अव-धूत: जिसके मन से धूल, धुंआ पूरी तरह साफ़ हो गया, वो अवधूत। क्या दिखता है अवधूत को अपने साफ़ मन से?

जगत, जो हमारी इन्द्रियों से प्रतीत होता है, वो मात्र पदार्थ है। कुछ भी ऐसा नहीं है जगत में, जिसे आँखों से देखा न…

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org