सत्य — सज़ा भी, दवा भी

मन जैसे जैसे सच्चाई के संपर्क में आता है, उसके साथ दो घटनाएँ घटती हैं। पहली तो ये कि डर छोड़ता जाता है और दूसरी ये कि क्योंकि वो डर से ही पोषण पाता था, डर पर ही ज़िंदा रहता था, तो डर छोड़ने के कारण बेचैन होता जाता है। ये तो उसको दिखता है कि डर छोड़ा है, तो हल्कापन है। ये तो उसको दिखता है कि ज़िम्मेदारी छोड़ी है, भविष्य की चिंता छोड़ी है, तो एक हलकापन है। लेकिन आदत से मजबूर होता है। पुरानी आदत लगी होती है ना। पुरानी आदत उससे बोलती है कि तूने ज़िन्दगी में जो…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org