सच के रास्ते पर सकारात्मकता का क्या अर्थ है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगले दो सवाल थोड़े जुड़े हुए हैं। आजकल की आध्यात्मिक वर्णावली में ये दो शब्द हैं जो काफ़ी प्रचलित हैं। उनसे सवाल है।

आचार्य जी, कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसी हो जाती हैं जहाँ सकारात्मक दृष्टिकोण रख पाना असम्भव हो जाता है। प्रश्न ये है कि सकारात्मकता क्या होती है और सत्य के रास्ते पर सकारात्मकता का क्या अर्थ है?

और दूसरा इससे मिलता-जुलता सवाल है। आचार्य जी, पिछले कुछ महीनों में मुझे प्रकृति के साथ समय बिताने का काफ़ी मौक़ा मिला है और मुझे बार-बार यह सन्देश मिला है कि जस्ट बी! (मात्र साक्षी हो!) कुछ बनने का प्रयास न करो। और मैंने पाया है कि मैं बचपन से ही कुछ बनने के लिए कार्यरत हूँ। तो इन दोनों शब्दों के अर्थ समझना चाह रही हूँ — जस्ट बी और सकारात्मक दृष्टिकोण।

आचार्य प्रशांत: सत्य की साधना में सकारात्मक दृष्टिकोण का अर्थ होता है श्रद्धा — अडिग, अजन्मा, अकारण, अ-कहा विश्वास कि जिसकी ओर जा रहे हैं, उसको न पाना नामुमकिन है। कि जिसकी ओर जा रहे हैं वो मिला ही हुआ है।

जब दुनिया में किसी लक्ष्य की ओर आप बढ़ते हैं, किसी वस्तु इत्यादि की ओर, तो सकारात्मक दृष्टिकोण का अर्थ होता है कि आप ये विचार रखें, ये आशा रखें, ये उम्मीद रखें कि आप जो पाना चाहते हैं उसको पा लेंगे।

सत्य की साधना में सकारात्मक दृष्टिकोण का अर्थ होता है कि विचार की नौबत ही न आये। ये सोचना भी न पड़े कि जो पाना है वो ज़रूर मिलेगा। ये विचार तो नहीं ही आ रहा कि जो पाना चाहते हैं वो नहीं मिलेगा, ये विचार भी नहीं आ रहा है कि जो पाना चाहते हैं वो मिल जाएगा। जब ऐसी स्थिति आ जाए तो समझिए साधक का दृष्टिकोण सकारात्मक हुआ। और सत्य की साधना में सत्य को लेकर जो विचार करने लगा, भले ही वो विचार आशा में पगा हुआ हो, वो साधक श्रद्धारहित है। उसे कुछ नहीं मिलेगा।

आम बातचीत में सकारात्मक होने का अर्थ होता है अच्छा सोचना — भला होगा, शुभ होगा, अच्छा होगा। साधक के लिए सकारात्मक होने का अर्थ होता है ‘न सोचना’। वो सोच ही नहीं रहा कि क्या होगा। जो न सोचे वो सकारात्मक हो गया। उसको अब श्रद्धा है, उसमें प्रेम है। वो ख़याल ही नहीं कर रहा आगे का। उसका भरोसा विचार और गणना और आशा से बहुत ऊँचा है। वो आशा नहीं कर रहा कि उसे विजय मिलेगी, वो जानता है कि उसे विजय मिलेगी। अब सोचना क्या है! वो ये भी नहीं जानता कि उसे विजय मिलेगी, वो जानता है कि उसे विजय मिल ही गयी है; अब सोचना क्या! बात आगे की है ही नहीं।

सच्चाई की राह चलने का फ़ायदा ही यही है — विजय तुम्हें भविष्य में नहीं मिलती, जिस क्षण तुमने सही राह पकड़ी, तुम विजयी हो गये। हाँ, बाहर-बाहर अभी यात्रा चलती रहेगी…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org