संसार श्रम, सत्य विश्राम

संसार श्रम है, संसार का अर्थ ही है मन का भागना। श्रम से अर्थ शारीरिक श्रम नहीं है कि माँसपेशियाँ हिल-डुल रही हैं। सारा श्रम मानसिक होता है। सभी कुछ मानसिक है, श्रम भी मानसिक है। इसलिए संसार में किसी को कुछ मिल नहीं सकता, सिवाय थकान के।

कबीर कहते हैं-
ये संसार काँटों की झाड़ी,
उलझ-उलझ मर जाना है,
ये संसार कागज़ की पुड़िया,
बूँद पड़े घुल जाना है।
रहना नहीं देश बेग़ाना है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org