संकल्प पूरे क्यों नहीं कर पाते?

(स्पष्टता के लिए संपादित। आचार्य प्रशांत के संवाद सत्र से एक अंश।)

हमारे ज़्यादातर काम माहौल के प्रभाव में शुरू होते हैं। वो इसलिए नहीं शुरू होते कि हमें दिखा है कोई चीज़ महत्त्वपूर्ण है, तो हम कर रहे हैं उसको। वो इसलिए शुरू होते हैं क्योंकि कुछ ऐसा हुआ है, या किसी ने आकर कुछ कह दिया, कोई खास दिन आ गया, कुछ ऐसा हो गया।

ये शुरुआत ही गड़बड़ है। फिर आगे भी गड़बड़ होती है। आगे क्या गड़बड़ होती है? कि काम तो कर रहे हो, लेकिन मन की जो टेनडेनसी (वृत्ति) हैं गहरी, भीतरी, वो शांत नहीं हैं।

वो शांत नहीं है। तो वो मन फिर डगमग-डगमग चलता है। वो ज़बरदस्ती का मल्टी-टास्क (बहु-कार्यण) करना है। मल्टी-टास्क (बहु-कार्यण) को भी हमने बना लिया है कि बहुत बड़ी बात है।

हमारा मन ऐसा हो गया है कि वो लगा ही रहता है हर समय मल्टी-टास्क (बहु-कार्यण) में; जहाँ ज़रूरत नहीं है, वहाँ भी। अब जैसे यहाँ बैठे हो, तो अभी तो बैठे हो! अभी जा नहीं रहे हो बाहर। तो अभी कोई ज़रूरत नहीं है बाहर जाने की तैयारी करने की। दो मिनट बाद जाओगे ना? अभी तो नहीं जा रहे हो। तो अभी बिल्कुल मस्त होकर बैठ सकते हो। मस्त बिलकुल!

पर बैग पकड़ रखा है। आवश्यकता क्या है बैग पकड़ने की? अभी जा रहे हो क्या? इस क्षण तो नहीं जा रहे हो, अगले क्षण जाओगे। तो जब जाना, तो उठा लेना। पर अभी क्यों थक रहे हो? मुट्ठियाँ भींच रखी हैं, पकड़ रखा है, थक रहे हो ना ज़बरदस्ती। और सुनने से ध्यान भी हट रहा है।

मन को ऐसा कर लो कि वो खुद ही जो कुछ अभी व्यर्थ है, उसमें पड़े ही ना।

पर हमनें मन को ऐसा कर रखा है कि वो एक साथ दस कामों की तैयारी करता रहता है। अभी में भी वो भविष्य की तैयारी करता है — “अभी तो नहीं जा रहा बाहर, पर पाँच मिनट में मैं बाहर जाऊँगा ना, तो अभी से बैग तैयार कर लूँ।”

कई लोगों को देखा है, उनकी ट्रैन होती है दस बजे की और वो सुबह चार बजे से उठकर तैयार होने लग जाते हैं, और पूरे घर में हल्ला करते हैं, “ट्रेन है… ट्रेन है…।” देखे हैं ऐसे लोग?

और वो कहते हैं, “हम तो बड़े सावधान हैं, बड़े परिपक्व हैं। और ये परिपक्वता की निशानी है कि पहले ही तैयारी-वैयारी करके अच्छे से बैठ जाओ। ये हमारी परिपक्व होने की बात है।” क्या ये परिपक्वता की बात है? इससे सिर्फ़ यही पता चलता है कि अभी जो करना नहीं है, मन उसकी ओर भाग रहा है; भविष्य की ओर भाग रहा है, और दूसरे कामों की ओर भाग रहा है।

वो तो तुम चलो संभाल लोगी, फिर जो दूसरी चीज़ है, इसके लिए थोड़ी साधना करनी पड़ेगी। इसके लिए खाने-पीने का ध्यान देना पड़ता है। इसके लिए अच्छी रीडिंग करनी पड़ती है। इसके लिए देखना पड़ता है…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org