संकल्पशक्ति बढ़ाने का ज़बरदस्त तरीका

आचार्य प्रशांत: पहले वो लक्ष्य आता है जिसका आपने संकल्प किया। पर आप कहते हो कि, “मैं अभी ज़िन्दगी को देख रहा हूँ उसमें दिखाई पड़ रही है थोड़ी बहुत शक्ति, थोड़ी ऊर्जा, थोड़ा मनोबल, तो इसी के अनुपात में मैंने अपने लिए एक छोटा सा लक्ष्य निर्धारित कर लिया।” वो छोटा सा लक्ष्य अगर मिल भी गया तो क्या मिला?

लेकिन आपको लगेगा कि, “मैंने तो अपनी शत-प्रतिशत ऊर्जा लगा करके इस लक्ष्य को हासिल किया है।” नहीं, आपको ऐसा लग रहा है कि आपने अपनी सारी ऊर्जा लगा दी है। आपने जितनी लगा दी है, आपके पास उससे दस गुना ज़्यादा ऊर्जा थी पर वो सोई पड़ी रही क्योंकि उसका कोई उपयोग ही नहीं था। वो क्या करती जग करके? करती क्या जग करके?

आपने अपने लिए लक्ष्य ही यही बनाया है कि आपको यहाँ से उठ कर उस दरवाज़े तक जाना है तो आप करोगे क्या दौड़ लगा करके? साधारण चाल चलोगे तो भी पहुँच जाओगे, बहुत ऊर्जा की आपको ज़रुरत ही नहीं। समझ रहे हो?

जो भी छोटी-छोटी कामनाएँ हैं वो आपको सीमित ही नहीं रखती हैं वो आपके मन में ये बात डाल देती हैं कि सीमित होना आपकी किस्मत है। छोटी कामना खुद ही छोटी नहीं है वो आपको भी छोटा बना देती है। बड़े की माँग करिए, बड़े की चाहत करिए।

बड़े से मतलब समझ रहे हो? आध्यात्मिक भाषा में बड़े का क्या अर्थ होता है? वो जो आपका आतंरिक छुटपन मिटा दे। आतंरिक छुटपन क्या होता है? किसी से दो रूपए झपट लिए, किसी को आगे बढ़ते देखा तो ईर्ष्या होने लग गई, किसी ने थोड़ा धमका दिया तो डर गए, कहीं कुछ गलत होते भी देखा तो कहा, “इसमें मेरा क्या जाता है।” ये आतंरिक छुटपन है। तो फिर बड़ा लक्ष्य क्या हुआ? कुछ ऐसा पाने निकलिए, कुछ ऐसा करने बढ़िए, जो आपके भीतर इन चीज़ों को बचा न रहने दे।

आप अपने-आपको भूल जाएँ जिसकी सेवा में वो लक्ष्य बड़ा कहलाता है। आप अपनी सब छोटी-छोटी ख़्वाहिशों को एकदम बस भूल ही जाएँ बिना कोशिश किए, ऐसा लक्ष्य बड़ा कहलाता है। और ऐसा बड़ा लक्ष्य जब आप बना लेते हैं तो फिर देखिए कि भीतर से कितनी जान अपने आप उठती है। उठनी ही पड़ेगी, समझ रहे हो?

छोटी माँगों में, एक छोटी ज़िन्दगी जीना, और छोटे ही बन कर रह जाना, इसमें कुछ नहीं रखा है। यही करते-करते एक दिन ख़त्म हो जाओगे। “मेरी इच्छा, मेरा पैसा, मेरी इज़्ज़त”, इनमें कुछ नहीं रखा। कुछ समझ में आई बात?

बड़ा काम वो नहीं होता जिसमें आपको बड़ा पैसा मिल रहा है, या दुनिया जिसमें आपको कह रही है कि, “ये तो बड़ी पदवी पर है, बड़ी कंपनी है, करियर प्रॉस्पेक्ट्स (रोज़गार के अवसर) अच्छे हैं।” बड़ा काम वो नहीं होता। बड़ा काम वो होता है जो आपको छोटा न रहने दे। वो काम ऐसा है कि अगर पूरा करना है तो तुम्हें भीतर से ख़ुद को बदलना पड़ेगा। तुम, तुम रहकर उस संकल्प…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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