श्री कृष्ण के ह्रदय में अर्जुन के लिए इतना स्नेह क्यों?

श्री कृष्ण के ह्रदय में अर्जुन के लिए इतना स्नेह क्यों?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। श्रीकृष्ण को अर्जुन से विशेष प्रेम था। अर्जुन के लिए श्रीकृष्ण ने भीष्म के विरुद्ध भी अस्त्र उठा लिये थे, तब जबकि उन्होंने युद्ध में अस्त्र न उठाने का वचन दिया था। सूर्य को सुदर्शन चक्र से छुपाकर कुछ देर के लिए सूर्यास्त जैसा वातावरण भी कर लिया था। कृष्ण का ऐसा प्रेम अन्य योद्धाओं के प्रति नहीं दिखता। अर्जुन में ऐसी क्या विशेषता थी कि उन्हें श्रीकृष्ण का इतना स्नेह मिला?

आचार्य प्रशांत: अर्जुन की विशेषता यह थी कि अर्जुन के पास सवाल थे, उसमें आत्मविश्वास ज़रा कम था, अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ, अर्जुन को ज़रा अनिश्चितता दिखी, अर्जुन को संदेह उठा, अर्जुन में जिज्ञासा उठी।

आओ, चलो कुरुक्षेत्र चलते हैं। पहला दिन है, आमने-सामने सेनाएँ डटी हुई हैं। मुझे बताओ कोई दिख रहा है तुम्हें जो संशय में हो? कोई दिख रहा है तुम्हें जो कहता हो कि, “मुझे नहीं मालूम है कि मुझे क्या करना चाहिए”? कोई है जो अनुभव कर रहा हो कि वो नासमझ है और अज्ञानी है? कोई है जो पशोपेश में फँसा हुआ हो?

सब बड़े आत्मविश्वास में हैं। सबको पक्का भरोसा है कि उनको धर्म का ज्ञान है ही।

दुर्योधन से पूछोगे अगर, तो दुर्योधन कहेगा, “मेरा धर्म ये है कि जो राज्य मैंने पा लिया है, पकड़ लिया है, द्यूत में जीत लिया है, उसको अब मैं जाने न दूँ।” वो कृष्ण से कहता है कि “सुई की नोक पर जितनी मिट्टी आ सकती है, उतनी भूमि भी मैं पांडवों को नहीं दूँगा क्योंकि पूरा राज्य ही मेरा है। जीत तो लिया मैंने, मैं क्यों दूँ?”

और दुर्योधन की नज़र में दुर्योधन पूरी तरह धार्मिक है। दुर्योधन कह रहा है, “एक बात बताओ, भाई, बँटवारा हुआ था बाकायदा। आधा राज्य मिला था कौरवों को और आधा राज्य मिला था पांडवों को। फिर पांडव आए और जुआ खेला, और अपना सारा राज्य वो हार गए। और सारा राज्य किसको दे गए? दुर्योधन को। अब तुम सारा राज्य जब हार चुके हो, तो अब तुम किस बिनाह पर राज्य वापस माँगने आए हो?” दुर्योधन कह रहा कि “मुझे बिलकुल पता है कि धर्म क्या है। जीता हुआ नहीं लौटाया जाता, यही धर्म है। जो वस्तु जिसकी है, उस पर उसका हक़ है, यही मेरा धर्म है।” दुर्योधन को कोई संशय नहीं।

आओ भीष्म की ओर चलें। भीष्म को कोई संशय है? भीष्म कह रहे हैं कि, “मैंने, अरे, बहुत पहले वचन दिया था कि हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति मेरी निष्ठा है। जो भी कोई उस सिंहासन पर बैठेगा, मैं उसका सहयोगी हुआ, सहायक हुआ, कह लो कि नौकर हुआ। तो मुझे मेरा धर्म बिलकुल पता है। क्या है मेरा धर्म? जो भी कोई हस्तिनापुर का राजा है, मुझे उसके साथ रहना है। और हस्तिनापुर का वर्तमान शासक कौन है? धृतराष्ट्र।”

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org