शिव की तीन आँखों का अर्थ क्या?

प्रश्नकर्ता (प्र): शिव जी की तीन आंखों की परिभाषा सूर्य, चंद्रमा, अग्नि है। इनका क्या अर्थ है?

आचार्य प्रशांत (आचार्य): सूरज और चंद्रमा, दिन और रात के प्रतीक हैं। दिन और रात मतलब द्वैत के दो सिरे। दिन व रात मतलब वो सब कुछ जो हमें खंडित प्रतीत होता है। दिन व रात मतलब वो सब कुछ जो साधारण आँखों से दिखता है।

प्र: खंडित मतलब?

आचार्य: बँटा हुआ। दिन व रात बँटे हुए हैं। दिन अलग है, रात अलग है। तो जो दो आँखें हैं, जिन्हें हम साधारण आँखें कहते हैं; वो सिर्फ़ वही सब कुछ देख पाती है जो द्वैतात्मक है। जिसका कोई विपरीत है। आप अपनी आँखों से ऐसा कुछ नहीं देख सकते जिसका कोई विपरीत न हो। आपको सफेद दिखेगा तो काला भी दिखेगा। और काले की पृष्ठभूमि में ही सफेद दिखेगा। तो सूरज और चंद्रमा को देख पाने का अर्थ है संसार को देख पाना। दो आँखें तो हो गई जो संसार को देख पाती हैं।

तीसरी आँख का प्रतीक यदि अग्नि है तो उसका अर्थ है भस्मीकरण कर देना, नष्ट कर देना, पूरे ही तरीके से राख कर देना। ये दो आँखें जो कुछ देखती हैं, तो तीसरी आँख है, जो बोध की आँख है, जो शरीरी नहीं है वो उस सब के प्रपंच को जाहिर कर देती है।

ये (दोनों) आँखें तो वो है जो संसार दिखाएगी। और संसार देखने का ही अर्थ एक तरीक़े से होता है प्रवंचना देखना, झूठ देखना। वो देखना जो सिर्फ़ चेतना की आपकी स्थिति पर निर्भर करता है। वो देखना जो समय के भीतर है और इस कारण जल्दी ही लुप्त हो जाएगा। उस मामले में शिव बिलकुल हमारे जैसे हैं। वो भी वही सब कुछ देख रहे हैं जो आप देख रहे हैं। आपकी आँखें भी द्वैत देखती हैं, उनकी भी दो आँखें द्वैत देखती हैं। और फिर तीसरी आँख है वहाँ। और जिसकी ही तीसरी आँख खुल गई वो शिव हो गया। शिव की परिभाषा ही यही है जिसकी तीसरी आँख खुल गई हो।

तीसरी आँख खुलने का अर्थ ये नहीं कि अब कुछ विशेष दिखने लगा, कि दो आँखों से कम दिखता था, तीन आंखों से ज़्यादा दिखने लगा। तीसरी आँख खुलने का अर्थ है कि दो आँखों से जो दिखता था उसका मिथ्यापन भी दिखने लगा। तो संसार भी दिख रहा है और संसार का छद्म होना भी दिख रहा है। और कोई है आँखों के पीछे जो छद्म को छद्म घोषित कर रहा है। कुछ ऐसा सत्य है जो बता रहा है कि जो झूठ है, जो मिथ्या है, वो मिथ्या है। वो भ्रम को भ्रम, अध्यास को अध्यास कह रहा है।

क्या भ्रम स्वयं को भ्रम घोषित करता है? क्या भ्रम स्वयं कहने आता है कि, “मैं भ्रम हूँ”? आप कब कह सकते हो कि ये भ्रम है? जब आप भ्रमित न हो। यानी कि बोध ही घोषणा कर पाता है भ्रम के भ्रम होने की। वो तीसरी आँख हुई।

दो आँखें जो दिखाएँ वो यूँ ही काम-चलाऊ। सत्य यदि आप उसे बोले भी तो बड़े निचले…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org