शास्त्रों के स्रोत का अनुमान नहीं लगाना चाहिए

प्रश्नकर्ता: सर, अष्टावक्र गीता पढ़ कर कुछ समझ नहीं आया क्योंकि इसमें सीधे कह दिया गया है कि ऐसा है। कृपया यह किस प्रक्रिया से निकल कर आ रही है उस पर कुछ कहें।

आचार्य प्रशांत: तुम नाच रहे हो, तुम शिवपुरी गए हो और तुम पानी में घुसे हुए हो और तुम पूरी मस्ती ले रहे हो पानी में घुस के। ठीक है? और उस समय पर तुमसे कोई पूछता है कि “अंशु,(प्रश्नकर्ता की ओर इशारा करते हुए) क्या कर रहे हो? कैसा अनुभव हो रहा है?” तो क्या जवाब दोगे? और वो जवाब कैसा होगा? किस रूप में होगा? जल्दी से बोलो?

प्र: उस अनुभव के जैसा ही होगा।

आचार्य: तुम पानी में घुसे ही हुए हो, लहरों के बीच में हो और मौज में हो और कोई पूछता है “कैसा लग रहा है? बताइए आपको कैसा अनुभव हो रहा है?” तो क्या बोलोगे? तुमसे मुकुल जी (दूसरे श्रोता की ओर इशारा करते हुए) पूछने आए हैं और गंगा बह रही है और तुम पागलों की तरह गंगा की मौज में हो और मुकुल जी पूछने आए हैं “हाँ जी, तो कैसा लग रहा है आपको?” तो क्या जवाब दोगे?

प्र: चिलाएँगे, सर।

आचार्य: और चिल्ला कर कितना बोलोगे?

प्र: बहुत कम, एक-आधा शब्द।

आचार्य: सूत्रों का यही मतलब होता है कि ज़्यादा बोला ही नहीं जा रहा तो बोलें क्या? कोई मूवी देख रहे हो और वहाँ सामने दृश्य चल रहा है और तुम बिल्कुल गद-गद हो गए हो, भर गए हो, उस समय पर क्या पड़ोसी से खूब सारी बातें करने का मन करता है तुम्हारा?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य: हम जब मूवी देख कर निकले तो उसके बाद कुंदन (एक श्रोता) ने कहा कि “मैं इसके बारे में कोई बात करना ही नहीं चाहता। अगर कोई पूछेगा कैसी लगी तो दो शब्दों में बोल दूंगा, बस।” सूत्रों का यही अर्थ होता है कि ज़्यादा बात की नहीं जा सकती और हमें ज़्यादा बात करने में कोई मज़ा भी नहीं आता। हमने पूरी बात तुम्हारे सामने दो शब्दों में रख दी है, समझ सकते हो तो समझ लो और ऐसा नहीं है कि हम तुमसे कुछ छुपा रहे हैं। हम जहाँ पर है वहाँ इस से ज़्यादा बोला नहीं जाता। इससे ज़्यादा बोला जाता नहीं है, हम कोई प्रोफेशनल राइटर थोड़ी हैं कि पन्ने पर पन्ने भरे जा रहे हैं।

अष्टावक्र गीता - इसमें तो फिर भी बहुत शब्दों का प्रयोग हुआ है, ब्रह्म सूत्र हैं उनमें दो-दो शब्द के सूत्र हैं बस। ऐसा नहीं है कि दो ही शब्द हैं, पर दो-दो शब्दों वाले भी हैं, इतने छोटे। यह फ़ालतू बोलना क्या है यार? कितना बोलते हो? चुप क्यों नहीं होते? क्या होता है एक बार, तीन ज़ेन मोंक होते हैं वो घूमने निकलते हैं, कहते हैं “लम्बा घूम कर आना है” वो चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं, चुप हैं। एक…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org