व्यर्थ चीज़ों को जीवन से कैसे हटाएँ?

व्यर्थ चीज़ों को जीवन से कैसे हटाएँ?

एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते। उदितावगतिज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत्।।42।।

अर्थ:

जब आत्मा के निम्न और उच्च पहलुओं का मंथन किया जाता है, तो उससे ज्ञानाग्नि उत्पन्न होती है। जिसकी प्रचंड ज्वालाएँ हमारे भीतर के अज्ञान-ईंधन को जलाकर राख कर देती हैं।

~ आत्मबोध, श्लोक ४२

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org