वो बात बिल्कुल याद नहीं आती?

प्रश्नकर्ता: पिछले बाईस वर्षों से मैं एक साधना कर रहा था। अब ऐसा लगता है कि मैं ग़लत रास्ते पर साधना कर रहा था। तो इस संबंध में एक चौपाई आई है कि शिव जी कहते हैं कि,

उमा कहूँ मैं अनुभव अपना।

सत हरि भजन जगत सब सपना।।

आचार्य जी, मैं आपसे प्रार्थना करूँगा कि इसमें जो ‘भजन’ और ‘सपना’ है, उसका अर्थ मुझे समझा दीजिए। उसको हम अपने जीवन में कैसे ढालें? कैसे उसको अपने जीवन में अपनाएँ? इस समय मैं कोई साधना नहीं कर रहा हूँ और बिल्कुल खाली हूँ, और मैं चाहता हूँ कि आप मेरा मार्गदर्शन करें ताकि मैं अपने जीवन में हरि भजन और जगत के स्वप्नवत होने की बात को जी सकूँ।

आचार्य प्रशांत: मनुष्य कौन है और उसको अध्यात्म की, चाहे हरि की, चाहे राम की, या फिर चाहे संसार की, चाहे प्रकृति की, चाहे माया की ,कुछ भी ज़रूरत ही क्या है?

बहुत आख्याएँ सुनी हैं हमने, और अभी एक छंद कह दिया, उसकी व्याख्या करने से पहले संदर्भ तो स्पष्ट होना चाहिए।

क्यों शिव उमा को कोई उपदेश दें, कुछ अनुभव बताएँ? कौन हैं उमा? और उन्हें आवश्यकता क्या है शिव के साथ की या शिव के ज्ञान की? उत्तर इसका हमें पुस्तकों से मिल सकता है, लेकिन अगर किताबी होगा इस शुरुआती प्रश्न का उत्तर ही, तो आगे की भी हमारी सारी प्रेरणा किताबी ही होगी, आत्मिक नहीं। हरि, राम, अध्यात्म — इनकी हमें आवश्यकता क्या है, इसका उत्तर हमें किताबों से नहीं, अपने अनुभव से मिलना चाहिए। ध्यान रखिए, मैंने अभी ये नहीं कहा कि उस आवश्यकता की पूर्ति कैसे होगी इसका अनुभव हो सकता है, या इसका उत्तर हमें अपने अनुभवों से मिल सकता है। अनुभव हमारे आवश्यक हैं हमें ये बताने के लिए कि हम कौन हैं, और इसीलिए हमें चाहिए क्या।

अनुभवगत ही कुछ होता है जो हमें — चाहे प्रकृति और माया की और चाहे अध्यात्म और राम की दिशा में भेजता है। अनुभवगत क्या होता है ऐसा? अनुभवगत एक विभाजन होता है, दूरी होती है। वहाँ से ही सारी प्रेरणा आरंभ होती है।

तो इस प्रसंग में तो शिव-पार्वती संवाद का उल्लेख भर देख लिया आपने, और उससे पहले का और उसके आगे का कुछ याद है कि कैसे जब उमा के पास शिव नहीं थे तो बालिका होकर भी वो शिव को याद करती थीं? कथा के मर्म को समझिए। कहते हैं, उन्होंने आँखों से कभी देखा नहीं था शिव को, कानों से कोई कथा भी नहीं सुनी थी, फिर भी वो जानती थीं कि जहाँ पैदा हुई हैं, उन राजा-रानी का घर सही जगह नहीं है उनकी। थोड़ी-सी आयु परिपक्व होते ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि, “है एक, भोला पशुपति, उसी के साथ जाना है, उसी से ब्याह होना है, उसी से ब्याह हो चुका है मेरा।” और फिर एक अवस्था आती है जब पाती हैं कि अब शिव से गठबंधन पर आँच आ रही…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org