वो काठ के योद्धा होते हैं जिन्हें डर नहीं लगता

इंसान होने का मतलब ही यही है कि एक तल पर आत्मा है और दूसरे तल पर तमाम डर, विचार, परेशानियाँ, चिंताएँ, अहंकार — वो मौजूद रहेंगे।

इंसान होने का मतलब ही यही है कि सदा दोनों तल मौजूद रहेंगे, पर तुम्हें देखना है कि तुम्हें किस तल को वरीयता देनी है।

तुम्हें डर के साथ डर जाना है, या तुम्हें आत्मा के साथ निर्भीक रहना है — यह फैसला करने का हक़ है तुम्हें।

डर उठेगा, लेकिन तुम्हें यह फैसला करना है कि डर के आगे घुटने टेक देने हैं, या कहना है, “डर तू बड़ा है, पर तुझसे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ और है। मैं तेरे कारण रुक नहीं सकता।”

अगला कदम कहाँ रखें यह साफ़-साफ़ दिख नहीं रहा आपको, कोहरा है, अस्पष्टता है, कुछ पता नहीं चल रहा कि अगला कदम क्या लें, खतरा भी है, गिर सकते हैं, पता नहीं कहाँ कदम रख दिया। लेकिन हम वो खतरा उठाएँगे, हम आगे बढ़ेंगे, गिरने की संभावना है हम तब भी आगे बढ़ेंगे, हो सकता है गिर भी जाएँ, गिर जाएँगे तो उठेंगे, फ़िर भी आगे बढ़ेंगे। और जब ऐसे कर-कर के आगे बढ़ते रहते हो, तो फ़िर धीरे-धीरे मन समझ जाता है कि डर में कुछ रखा नहीं है।

वो डर जो पहले आतंकित करता था, फ़िर समझ जाते हो इसका तो यही काम है। “पहले भी तूने यही किया था, तो जब हम पहले नहीं रुके। तो अब कैसे रुक जाएँगे? जब तू इतना बड़ा हो के सामने खड़ा होता था, तब हमने तुझे भाव नहीं दिया, अब क्यों देंगे?”

डर रहेगा, हमेशा रहेगा।

लेकिन तुम जितना मन को साफ करते जाओगे, जितना तुम

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org