विदेशी कंपनियाँ और बाज़ारवाद: पतन भाषा, संस्कृति व धर्म का

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते।

इतिहास है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के कारण हमने बहुत ग़ुलामी झेली। आज अनेकों विदेशी कंपनियाँ हैं बाज़ार में, क्या वो भी ग़ुलाम बना रही हैं हमें? आर्थिक पक्ष तो एक तरफ़ है, मैं आपसे समझना चाहता हूँ कि इन कंपनियों का हम पर मानसिक और सांस्कृतिक रूप से क्या असर पड़ता है?

आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता कह रहे हैं कि भारत के बाज़ार में आज अनेकों विदेशी कंपनियाँ हैं, इनका भारतीयों पर, देश पर, मानसिक और सांस्कृतिक रूप से क्या असर पड़ता है? आर्थिक पक्ष की बात नहीं करना चाहते हैं। ठीक है, आर्थिक पक्ष की बात नहीं करेंगे।

समझते हैं इसको।

देखो, किसी भी चीज़ के बिकने के लिए दो-तीन शर्तें हैं। एक तो ये कि—वो चीज़ निर्मित, पैदा करने वाला, उत्पादन करने वाला कोई होना चाहिए, है न? उस चीज़ को पैदा करने वाला कोई होना चाहिए। ये तो पहली बात हुई। ये सब बहुत सीधी-सादी बातें हैं, बस मैं उनको दोहरा रहा हूँ। दूसरी बात—उस चीज़ के बिकने के लिए कोई बाज़ार, मार्केट होना चाहिए, है न? और तीसरी चीज़ जो कि तुम कहोगे ये तो बहुत सहज है, स्पष्ट है, पर उसकी बात करना बहुत ज़रूरी है। तुम्हारे सवाल का जवाब उस तीसरी चीज़ में ही छुपा हुआ है। तीसरी चीज़ है कि उसका खरीदार होना चाहिए।

वस्तु होनी चाहिए, बाज़ार होना चाहिए और ख़रीदार होना चाहिए। तो अगर मुझे कुछ बेचना है तो मुझे सिर्फ चीज़ नहीं तैयार करनी है, मुझे उस चीज़ का ख़रीदार भी तैयार करना है। ख़रीदार नहीं है तो चीज़ बिक नहीं सकती।

अब ये बेचने और ख़रीदने की बात क्या है, समझना।

भली-भाँति जानते हो तुम कि ज़्यादातर चीज़ें जो ख़रीदी-बेची जाती हैं, वो किसी मूलभूत आवश्यकता के कारण नहीं ख़रीदी जातीं। वो इसलिए ख़रीदी जाती हैं क्योंकि चलन है, या ये चीज़ अब प्रचलन में आ गई है, संस्कृति में आ गई है कि फलानी वस्तु तो आपके पास या आपके घर में होनी ही चाहिए। उदाहरण के लिए, भारतीय जब पहली दफ़ा अमेरिका जाते हैं तो उनमें से बहुतों का ये कहना होता है, "हम तो हैरान हैं कि अमेरिका के लोग कितनी फ़िज़ूल की चीज़ें ख़रीदते हैं और कितनी चीज़ें बर्बाद करते हैं!" अमेरिका के लोगों से पूछो तो कहेंगे, "नहीं, फ़िज़ूल में तो हम कुछ भी नहीं ख़रीदते, ना ही कुछ बर्बाद कर रहे हैं। ये जो हम ख़रीद रहे हैं, ये तो हमारी सच्ची ज़रूरतें हैं; जेन्युइन नीड्स हैं।" वो एक भारतीय को साफ़ दिखाई पड़ता है कि ये ज़रूरतें नहीं हैं, ये तो अय्याशी कर रहे हो तुम। तुम फ्रिज इस्तेमाल करते हो दो साल-तीन साल, उसके बाद उसको ले जाकर के सड़क किनारे छोड़ आते हो। यही हाल तुम कभी-कभी गाड़ियों के साथ करते हो। गाड़ी इस्तेमाल की, उसका कोई ग्राहक…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org