लखुआ भूत ने मॉडर्न ओझा बनकर दही चटाई (हम चाटते गए)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके हज़ारों वीडियोस हैं यूट्यूब पर, हर वीडियो में आपने किसी-न-किसी तरीके से धर्म या अध्यात्म की ही बात करी है — उपनिषद्, ब्रह्म, धर्म, अध्यात्म, भगवान। ये सब मिलकर भी दुनिया में जो इतना पाप, दु:ख, युद्ध, क्लेश, अवसाद, बलात्कार, हत्या इत्यादि है उसका आजतक खात्मा क्यों नहीं कर पाए?

दुनिया में सबसे धार्मिक देश भारत रहा है फिर भी भारत में इतने पाप होते रहे, लड़ाइयों में इतनी हार मिली भारत को। धर्म तो धर्म तब है न जब समाज से, मन से संताप मिटाए। वो मसीहा कैसा जो जनमानस को मुक्त ना कर पाए? तो बताइए मुझे कि धर्म आजतक भी पाप-पीड़ा, संताप, शोषण, युद्ध क्यों नहीं मिटा पाया?

आचार्य प्रशांत: दो चीज़ें हैं — एक जो तुम्हें दी और दूसरी जो तुमने उसका बना लिया। जो धर्म तुम्हें दिया गया वो ऋषियों के श्लोकों जैसा साफ, पवित्र था और जो धर्म तुमने बना लिया वो ज़रा अलग था, काफी अलग था।

तुम पूछ रहे हो कि “जब लड़ाइयाँ हो रही थी, पाप हो रहा था और जब युद्ध है और बलात्कार है और अवसाद है तो धर्म उन्हें आज तक कभी खत्म क्यों नहीं कर पाया पिछले हज़ारों सालों में?” क्योंकि तुम्हारा धर्म — ‘धर्म’ नहीं ‘तुम्हारा धर्म’, जो तुमने बना लिया है धर्म को — क्योंकि ‘तुम्हारा धर्म’ कहीं और व्यस्त था। ‘तुम्हारा धर्म’ व्यस्त था ये तय करने में कि बाल कटाए जाने चाहिए या नहीं कटाए जाने चाहिए। ‘तुम्हारा धर्म’ ये तय करने में व्यस्त था कि पीले रंग के परिधान पहनें या सफेद रंग के।

जो तुमने अपना प्रचलित धर्म बना रखा है उसे मतलब कहाँ रहा जीवन के मूल प्रश्नों से? उसे मतलब किन चीज़ों से रहा है? और आज भी जो समान्य जन संस्कृति में प्रचलित धर्म है उसको इन्हीं मुर्खतापूर्ण चीज़ों से ही मतलब है, “किस दिशा में मुँह करके खाना खाएँ?”

जो जनसाधारण में प्रचलित अध्यात्म है, वो इस प्रश्न का सामना ही कहाँ कर रहा है कि “अवसाद क्या है? और उसका समाधान क्या है?” कर रहा है क्या? या “युद्ध कहाँ से आता है? और युद्ध कैसे मिटाएँ?” अध्यात्म इन प्रश्नों का सामना ही नहीं कर रहा।

अध्यात्म कहीं और व्यस्त है। अध्यात्म व्यस्त है साँप उड़ाने में। अध्यात्म के सामने ये प्रश्न है कि “साँप किस तरीके से उड़ाया जा सकता है हवा में? और प्रतिमा पर दूध कितने क्विंटल चढ़ाना है?” उस पुजारी से जाकर के पूछो तुम, सवाल, कि, "साहब युद्ध की शुरुआत आदमी के मन में होती कहाँ से है?" तो उसे इस प्रश्न का उत्तर नहीं पता, क्यों नहीं पता? क्योंकि उसके जीवन में प्रश्न बिलकुल दूसरे हैं। उसके जीवन में प्रश्न ये है कि “दो दिन बाद मुझे ढाई-हज़ार किलो दूध की ज़रूरत है तो उसमें पानी कितना मिलाएँ? और दूध महँगा होता जा रहा है, फलानी जगह से लाएँगे तो इतने रुपए किलो पड़ेगा, वहाँ से लाएँगे तो इतने रुपए किलो पड़ेगा।” हमारा धर्म इन चीज़ों में व्यस्त है, तो जीवन के असली सवालों के जवाब कैसे दे धर्म?

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org