राम से दूरी ही सब दुर्बलताओं का कारण

राम से दूरी ही सब दुर्बलताओं का कारण

तुलसी राम कृपालु सों, कहिं सुनाऊँ गुण दोष।

होय दूबरी दीनता, परम पीन संतोष।।

~ संत तुलसीदास

आचार्य प्रशांतः कृपालु राम के आगे अपने सारे गुण-दोष खोल कर रख दो, कह दो, सुना दो। इससे जो तुम्हारी दीनता है, जो तुम्हारी लघुता है, जो तुम्हारी क्षुद्रता है, वो दूबरी हो जाएगी, कम हो जाएगी, और जो तुम्हारा संतोष है, तुम्हारे भीतर जो तृप्ति का भाव है, पूर्णता का भाव है, वो पुष्टि पाएगा।

ये बात क्या है कि रामचंद्र के सामने दिल खोल कर रख दो, उनको अपनी सारी कथा सुना दो, अपना सारा सुख-दुःख सुना दो? बात क्या है?

बात बहुत सीधी-सी है। संसार आईना है। तुम द्वैत में जीते हो। परमात्मा भी जब उतर कर तुम्हारे सामने आता है, राम भी जब अवतार ले कर तुम्हारे सामने आते हैं, तो वो द्वैत की दुनिया में आ गए हैं, वो आईनों की दुनिया में आ गए हैं। और द्वैत की दुनिया का एक नियम होता है, आईनों की दुनिया का एक नियम होता है: तुम्हें वही दिखाई देता है जो तुम हो।

तुम राम के सामने अपनी असलियत खोल कर रख दोगे, तभी तो राम तुम्हारे सामने अपनी असलियत खोल कर रख पाएँगे। तुम राम के सामने खुलोगे नहीं, राम तुम्हारे सामने खुलेंगे नहीं – ये तो संसार का नियम है। और जब राम तुम्हारे सामने आए हैं तो संसार के हिस्से बन गए; संसार का आधार, संसार का हिस्सा बन कर तुम्हारे सामने आता है। अब और वो क्या करेगा? लेकिन अवतार भी जब तुम्हारे सामने आता है तो यदा-कदा ही तुम्हें समझ में आता है। क्यों? यदा-कदा ही क्यों?

वो राम हैं, ये तुम्हें नज़र आए, इससे पहले तुम्हें खुलना होगा। उसका भेद खुल जाएगा तुम्हारे सामने, जब तुम अपना भेद खोल दोगे।

ये थोड़ी अजीब-सी बात है।

आप भक्त हो जाओ, भगवान प्रकट हो जाते हैं।

वरना भगवान भी सामने खड़े हैं और तुम उनके पाँव में नहीं गिरे, तो वो प्रकट कहाँ हुए तुम्हारे लिए? तुम्हारे लिए तो कुछ नहीं रहे।

तुम खुल जाओ, तुम बता दो कि, "मैं तो गिरने ही योग्य हूँ," वो खुल जाएँगे। राम हों तुम्हारे सामने तो एक ही फिर तुम्हारा कर्तव्य बचता है कि—अपने और उनके बीच ये जो दीवार बन कर ‘तुम’ खड़े हो, अपने-आपको हटा दो, हट जाओ।

जानते हो ये जो बीच की दीवार है, ये क्या है? ये तुम्हारा व्यक्तित्व है, ये तुम्हारी धारणाएँ हैं, ये तुम्हारा मन है। इसी को अहंकार बोलते हैं, इसी को जड़ मूर्खता बोलते हैं। एक दीवार में, चारदिवारी में अपने-आपको हमने क़ैद कर रखा है। उसके बाहर कोई खड़ा भी हो तो तुम्हें दिखेगा कैसे?

सामने वाले को, बाहर वाले को देखने का प्रयास छोड़ दो। तुम तो इस दीवार को गिरा दो जिसको तुमने नाम दे दिया है अपने व्यक्तित्व का, अपने कवच…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org