राम का भय ही पार लगाएगा

रामहि डरु करु राम सों ममता प्रीति प्रतीति।

तुलसी निरुपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति।।

~ संत तुलसीदास

आचार्य प्रशांत: ध्यान देना होगा! कुछ ऐसा है यहाँ पर जो आपको चौंका सकता है।

राम से ही डरो! हो राम से ही ममता-प्रीत और राम ही हों सर्वत्र प्रतीत। तुलसी निरुपधि राम, निरुपाधि राम, निर्गुण राम को भय, हारहुँ जीत।

हार को जीत में बदलने की कीमिया का नाम है राम! कि जैसे गुरु अंधेरे को प्रकाश में बदल देता है। तुलसी कह रहे हैं डर, तुलसी कह रहे हैं ममता, तुलसी कह रहे हैं प्रीति, तुलसी कह रहे हैं प्रतीति। आप उपनिषदों के पास जाएंगे तो वे कहेंगे ये सब भ्रम है। ममता भ्रम ममत्व, भय भ्रम, मोह भ्रम और जो कुछ भासता हो, प्रतीत होता हो वो तो निश्चित ही भ्रम।

फिर तुलसी क्यों कह रहे हैं राम से भय, राम से प्रीत, राम से ममता, राम ही प्रतीति? क्यों कह रहे हैं? गौर करेंगे! साथ रहेंगे तो आगे पता चल जाएगा!

जो राम के साथ है, जिसके लिए राम है, राम उसकी हार को भी जीत में बदल देते हैं। बड़ा मुश्किल है हमारे लिए अगर हमसे सीधे कह दिया जाए ‘ममत्व’ त्याग दो! बड़ा मुश्किल है हमारे लिए अगर हमसे सीधे कह दिया जाए ‘भय’ त्याग दो! और अति मुश्किल है अगर हमसे कह दिया जाए कि जो प्रतीत होता है उस सब को भ्रम मात्र जानो! तुलसी ने एक व्यवहारिक उपाय बताया और क्या है वह व्यवहारिक उपाय? वह कह रहे हैं छोड़ो तुम कि जो दिख रहा है वो झूठ है, कि जो कुछ प्रतीत होता है वह झूठ है, तुमसे हो नहीं पाएगा। प्रतीत तो तुम्हें होता ही रहेगा क्योंकि जन्म लेते ही एक अर्थ में तुम हार गए थे। अगर यह माया की जीत है कि माया के होते संसार तुम्हें भाषित होता है तो माया सदा की जीती हुई है तुम सदा के हारे हुए हो क्योंकि तुम्हारे होने में ही ‘ममत्व’ शुमार है। तुम्हारी आँख खुलती नहीं है की जगत तो तुम्हें दिखने लगता है। तुम्हारी एक-एक कोशिका भय जानती है तो अगर भय का एहसास और अगर ममता-मोह और अगर इंद्रियगत अनुभव हार हैं तो तुम हारे ही हुए हो। इस हार को तुम टाल नहीं पाओगे। यह तुम धोखा दोगे अपने आपको अगर तुम कहोगे नहीं! मैं तो मोह से मुक्त हो गया, मुझे कोई ममता नहीं। मुझे जगत दिखाई नहीं देता, मुझे कुछ पाना नहीं, कोई कामना नहीं, कोई मात्सर्य नहीं। झूठ! सारी पोल खुल जानी है। अगर कुछ तुम्हे आकर्षित नहीं करता तो इसका अर्थ इतना ही है कि अभी उसका आकर्षण इतना बड़ा नहीं है कि तुम्हें झुका सके। कुछ और आ जाएगा ज़्यादा लुभावना, ज़्यादा बली वह खींच लेगा तुमको। तुम पूर्ण नहीं हो तो तुम्हारा वैराग्य भी पूर्ण नहीं हो सकता। तुम पूर्ण नहीं हो तो तुम्हारा बोध पूर्ण नहीं हो सकता। तो हार तुम्हारी पक्की है अधिक से अधिक यह कर लोगे कि थोड़ा…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org