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ये प्रेम है! || आचार्य प्रशांत
प्रेम का रास्ता ऐसा है कि जैसे कोई औरत निकली हो बाजार में कुछ सौदा बेचने के लिए। कुछ छोटे-मोटे कपड़े हैं, कुछ सामान है, कुछ फल, कुछ सब्जियां और कोई शरारती बच्चा आकर के उसके ठेले से एक टमाटर उठा ले तो चिल्लाती है और गाली देती है। उसे प्यास लगी है। उसके पास पानी नहीं है। पर अपना ठेला छोड़ के नहीं जा सकती क्योंकि उसे पता है कि छोड़ा तो कुछ उठ सकता है, चोरी हो सकता है।
इस भय के मारे वो प्यासी घूम रही है। वो कह रही है ये इतनी कीमती चीजें हैं। इन्हें कोई ले गया तो क्या होगा? पर बात सही है। औरत गरीब है। उसकी दाल रोटी चलती है। उसी से सांझ को चूल्हा जलता है। और जमाना खतरनाक है। लोग स्त्री को अकेला जान रहे हैं। मोलभाव कर रहे हैं। तभी कोई आता है और उसे कहता है गांव की सरहद पर तुम्हारे पति को देखा। दसों साल विदेश में रह के वो लौट रहा है। और ये औरत अपनी सब्जी, भाजी, सारा सौदा, सब माल छोड़छाड़ के फेंक-फाक के बाली होके भागती है। सौदा तो उसने तोड़ ही दिया। उसके छोटे से थैले में कुछ सिक्के और वह ऐसा बेसुद भाग रही है कि सिक्के उछल-उछल के गिरते जा रहे हैं। लोग उससे कह रहे हैं अरे भाई तेरा पैसा देख पीछे छूटा उसे सुनाई ही नहीं पड़ रहा ना उसे कोई डर नहीं है। वो नंगे पांव है। उसके खून बह रहा है। उसे फर्क नहीं पड़ रहा।
इस वक्त कोई उसे रोक के दिखाए। ना उसे रुपया खोने का डर है। ना उसे किसी गाड़ी के नीचे आ जाने का डर है। चोट लगने का डर तो बहुत छोटी बात है। यह प्रेम है। प्रेम में डर विदा हो जाता है।
