यज्ञ का असली अर्थ समझो

यज्ञ का असली अर्थ समझो

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: |
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर || ३, ९ ||

यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है, इस यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है, उससे जन्म-मृत्युरूपी बँधन उत्पन्न होता है। अतः हे कुन्तीपुत्र! उस यज्ञ की पूर्ति के लिए संग दोष से मुक्त रहकर भली-भाँति कर्म का आचरण कर।
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ९

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org