मौत से नहीं, अधूरी मौत से डरते हैं हम

हमें मृत्यु का डर नहीं होता, हमें अपूर्ण मृत्यु का डर होता है। मौत से हम इसलिए घबराते हैं क्योंकि अधूरे हैं, जीवन अधूरा है इसलिए मौत डरावनी है, मौत अगर इतनी ही डरावनी चीज़ होती तो बहुतों ने जानते-बूझते, सब समझते मौत का वर्ण क्यों कर लिया होता?

मौत नहीं मुद्दा है, पूर्णता मुद्दा है, मौत तो ऐसा है जैसे घंटी का बजना, घंटी बज गई समय पूरा हुआ,घंटी नहीं डरावनी है, समय का सदुपयोग नहीं किया तब घंटी डरावनी

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org