मोहे पिया मिलन की आस!

मोहे पिया मिलन की आस!

कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो माँस। दोई नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।।

अर्थ: हे काग (कौवा) तन के हर जगह का माँस खाना पर आँखों का नहीं, क्योंकि मरने के बाद भी आँखों में पिया (प्रभु) मिलन की आस रहेगी ही रहेगी।

~ बाबा शेख फ़रीद

आचार्य प्रशांत: शेख फ़रीद ने वृद्धावस्था को लेकर और वियोग को लेकर ख़ूब कहा। तो कह रहे हैं कि वियोगी मन, वियोगी स्त्री राह तकते-तकते वृद्धा हो गयी, अब मौत सामने खड़ी है। और उस मुक़ाम पर वह कहती है कि, ‘अरे कागा, अरे कौवे, इस शरीर की मुझे बहुत परवाह नहीं। अब मर तो मैं जाऊँगी ही; तुझे जहाँ-जहाँ से माँस नोचना होगा, नोच लेना, चुग-चुग खा लेना, पर आँखें छोड़ देना मेरी। नैनों पर चोंच मत मारना।’ क्यों? उनमें पिया मिलन की आस है।

समझ रहे हो? तुम्हारी पूरी हस्ती में सिर्फ़ वो हिस्सा महत्वपूर्ण है जो प्रियतम से जुड़ा हुआ हो, जिसमें प्रियतम बसे हुए हों, बाक़ी सब सिर्फ़ माँस है। बाक़ी सब नष्ट हो जाए कोई बात नहीं। पर तुम्हारी हस्ती में जो कुछ ऐसा हो कि जुड़ गया प्रीतम से वो न नष्ट होना चाहिए, न नष्ट हो जाता है, जिसे अमर की आस है, वो भी अमर हो गया।

बात समझ में आ रही है?

बहुत कुछ हो तुम और बहुत दिशाओं में भागते हो तुम। तुम्हारे सारे उपक्रमों में, तुम्हारी सारी दिशाओं में सिर्फ़ वो काम और वो दिशा क़ीमती है, जो उस पिया की ओर जाती है। चौबीस घंटे का दिन हैं न? बहुत कुछ किया दिन भर? वो सब कचरा था। उसमें से क़ीमती क्या था? बस वो जिसकी दिशा प्रीतम की ओर थी। और फ़रीद साहब कह रहे हैं — ‘उसको बख्श देना। उसको गन्दा मत करना।’ बाक़ी सब तो हटाओ। और संत वो जिसका पूरा जिस्म ही समझ लो आँख बन गया। जिसकी धड़कन भी आँख बन गई। जो नख-शिख नैन हो गया। जिसका रोंया-रोंया, जिसकी हर कोशिका सिर्फ़ प्रीतम की ओर देख रही हैं। वो साँस ले रहा है, किसके लिए?

श्रोतागण: प्रीतम के लिए।

आचार्य: उसका हाथ उठ रहा है किसके लिए? दिल धड़क रहा है किसके लिए? वो आहार भी ले रहा है तो किसके लिए? वो गति भी कर रहा है तो किसके लिए? ऐसे जियो तो फिर फ़रीदों को जाना। वरना तो समय काटने के बहाने और तरीक़े हज़ारों हैं। थोड़ी गणित ही लगा लो। देख लिया करो रोज शयन से पहले; आज कितना प्रतिशत समय उसके ख़याल में, उसके ज़िक्र में, उसकी साधना में, उसके अनुसंधान में, उसके तसव्वुर में लगाया। कितना? जितना लगाया, बस समझ लो उतना ही समय तुम जिये। बाक़ी समय तो बेहोशी थी। जब बेहोश पड़े रहते हो तो क्या कहते हो कि अभी जीवन चल रहा है? बेहोश के लिए कैसा जीवन?

आँखें बचाने लायक सिर्फ़ तब हैं जब ‘उसको’ तलाशें। कान बचाने लायक सिर्फ़ तब हैं जब ‘उसको’ सुनें। कंठ, ज़बान, होंठ बचाने लायक सिर्फ़…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org