मैं लड़कियों से बात क्यों नहीं कर पाता?

प्रश्न: मैंने आमतौर पर देखा है कि मैं लड़कियों से सामने से बात नहीं कर पाता हूँ। पर किसी और माध्यम से कर लेता हूँ, जैसे वाट्सैप मैसेज आदि के द्वारा।

आचार्य प्रशांत: अपने सामने जब तुम किसी अपने-जैसे को पाते हो, तो उसको देखना कुछ हद तक अपनेआप को देखने जैसा हो जाता है। दुनिया का अवलोकन करने के पीछे यही समझ है कि दुनिया को देखोगे, तो आईने की तरह अपनेआप को देख लोगे। देख किसको रहे हो?

श्रोतागण: दुनिया को।

आचार्य: दुनिया को। पर दुनिया को देखोगे यदि, तो अपनेआप को देख लोगे। दुनिया की आँखों में झाँकना काफी हद तक अपनी आँख में झाँकने जैसा होता है, और उसमें प्रकृति भी तुम्हारी सहायता करती है। तुम जिसको देख रहे हो, उसका हाव-भाव तुम्हारे जैसा होगा, उसकी आँखें तुम्हारे जैसी होंगी, उसके संस्कार भी तुम्हारे जैसे होंगे। अपने ही जैसे किसी को देखना, अपनी ओर वापस मुड़ जाने जैसा है।

अब तुम्हारे सामने कोई जीवित व्यक्ति बैठा हो, उसकी आँख में आँख डाल कर बात करना बड़े साहस की बात होती है। क्योंकि उसको देखने का मतलब होगा अपनी सच्चाई से रु-ब–रू होना। झूठ बोलना मुश्किल हो जाता है। ये गौर किया है? आँख में आँख डाल कर झूठ बोलना मुश्किल हो जाता है। हाँ, कंप्यूटर स्क्रीन पर झूठ बोलना आसान होता है।

इसीलिए किसी लड़की को, या कोई भी और हो जिसे तुम धोखा देना चाहते हो, उसके सामने तुम ज़रा नर्वस हो जाओगे। तुम जिसको भी धोखा देने जा रहे होगे, उसकी आँख में आँख डाल कर नहीं देख पाओगे। मैं दोहरा रहा हूँ- किसी को देखना ध्यान से, तुम्हें तुम्हारी ओर मोड़ता है, किसी को भी ध्यान से देखना। उसी अर्थ में समूचा जगत गुरु बन जाता है।

गुरु का भी काम यही है। क्या? तुम्हें, तुम्हारी ओर मोड़ देना कि चलो संसार को छोड़ो, अपनी ओर वापस जाओ। और संसार में भी वस्तुओं से हट कर जब तुम जीवित व्यक्तियों को देखते हो, तो उस देखने की गुणवत्ता दूसरी होती है। कभी गौर किया है कि जानवर की भी आँख में देखो तो अचानक कुछ होता है? वो वही है। जानवर की आँख में देखना करीब-करीब अपनी आँख में देखने जैसा है, क्योंकि हम सब एक हैं। जगत आईना है।

तुम एक ख़ास उम्र में हो, उस उम्र में तुम्हें प्रेम का तो कुछ पता नहीं, पर वासनाएँ सिर चढ़ कर बोलती हैं। और तुम्हारे भीतर वो सत्य भी विराजमान है जो अच्छे से जानता है कि वासना प्रेम नहीं है। वासना प्रेम नहीं है। ठीक है? तुम्हारे संस्कारों ने उसको प्रेम का नाम दे दिया है, या जो भी कर दिया है, लेकिन बैठा है कोई तुम्हारे भीतर जो ये जानता है कि वासना प्रेम नहीं है। इस कारण कतराते हो जब वो सामने पड़ती है। प्रेम यदि होता तो कोई वजह नहीं थी घबराने की, कतराने की, शंकित हो जाने…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org