मैं दुविधा में क्यों रहती हूँ?

कैसे पता चले कि बाहरी आवाजें आ कर बैठ गई हैं? बहुत सरल है। देखो कि मन में दिन रात विचार किसका चल रहा है। तुम्हारा मन ही तुम्हारी प्रयोगशाला है। देख लो कि किसका विचार चल रहा है लगातार? जिसका विचार तुम्हारे मन में घूम रहा है, उसी ने तुम पर कब्ज़ा कर रखा है। अब वो विचार ध्यान रखना, ये भी हो सकता है कि तुम्हें किसी की मदद करनी है। तुम कहोगे “अरे! मैं उसकी मदद करने जा रहा हूँ। वो मुझ पे हावी कैसे हो सकता है, वो तो बेचारा है?” हो गई न चूक…

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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