मैं के आश्रय और अपूर्णता!

मैं के आश्रय और अपूर्णता

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहीनम् ।।४०।।

इंद्रियाँ, मन और बुद्धि इस काम के आश्रय स्थल कहे जाते हैं। इनके द्वारा विचार बुद्धि को आवृत करके यह काम जीव को मोह लेता है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४०

आचार्य प्रशांत: ‘इंद्रियाँ, मन और बुद्धि, इस काम के आश्रय स्थल कहे जाते हैं। इनके द्वारा विचार बुद्धि को आवृत करके’, मतलब ज्ञान को आवृत करके, छुपाकर, ‘यह काम, जीव को मोह लेता है।‘

काम की बात हो रही है। पिछले कुछ श्लोकों में काम की ही चर्चा थी, वही बात आगे बढ़ी है। अर्जुन ने प्रश्न किया था कि ‘कौन शत्रु है जीव का? कौन है जो जीव को मोहे लेता है और उससे तमाम तरह के पाप कराता है?’ तो उस पर कृष्ण का उत्तर था कि यह काम ही है, यही क्रोध बनता है, यही ज्ञान को ढके रहता है, जैसे धुआँ आग को ढके रहता है, गर्भ शिशु को ढके रहता है। यह काम ही है जो जीव का प्रथम शत्रु है।

तो उसी काम के विषय में कृष्ण आगे कह रहे हैं; क्या कहा? कि इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, इन जगहों पर काम आश्रय पाता है, और इसके द्वारा ज्ञान आच्छादित हो जाता है, और जीव मोहित हो जाता है। अब थोड़ा समझेंगे।

काम क्या है? कामना माने क्या? अहम् का ही दूसरा नाम काम है। ‘मैं’ भाव ही काम है। काम माने माँगना, इच्छा करना। स्वयं का होना ही कामना का पहला परिणाम होता है। अस्तित्व, ‘मैं’ भाव, ये होते ही तभी हैं जब कामना हो। कामना माने अपूर्णता। आप विचार करिएगा, जिन क्षणों में आप बहुत तृप्त होते हैं, उन क्षणों में आपका होना मिट जाता है, आप होंगे नहीं। और आपकी बड़ी परेशानियों की घड़ियाँ वो होती हैं जिनमें आप अपने होने को बहुत प्रबल रूप से अनुभव कर रहे होते हैं, विवश हो गए होते हैं अनुभव करने के लिए। इसको बहुत गहराई से अपने भीतर उतरने दीजिए।

अहम् माने काम। ‘मैं’ कोई तथ्य नहीं है; ‘मैं’ बस एक अपूर्णता है। और मैंने कहा, तथ्य नहीं है क्योंकि वो एक कल्पित अपूर्णता है। ‘मैं’ स्वयं को ही दिया गया ये भाव है, ये विचार है कि कहीं कुछ कमी है, कहीं कुछ अपूर्ण है। वो अपूर्णता दुखी तो बहुत करती है, लेकिन साथ-ही-साथ वो हमें अस्तित्व में रखती है। वो न हो तो हमारा होना मिट जाए और उस न होने को हम बीच–बीच में थोड़ा–बहुत अनुभव करते भी हैं। थोड़ा-बहुत ही अनुभव कर पाने की जैसे हमारी क्षमता हो, थोड़ा-बहुत अनुभव कर पाने के लिए हम लालायित रहते हैं — आनंद मिल जाए, तृप्ति मिल जाए, थोड़ा-बहुत मिल जाए, महीने में एक दिन मिल जाए, दिन में एक घड़ी मिल जाए। उससे अधिक वो होने लगता है तो हम स्वयं ही उसको बाधित कर देते हैं। क्योंकि तृप्ति…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org