मैं अपना दुख स्वयं हूँ!

मैं अपना दुख स्वयं हूँ!

‘स्वरूप निर्वाणं,’ ऋषि मंत्र दे रहे हैं —

स्वरुप निर्वाणं

निर्वापित होने का अर्थ होता है जो जल रहा है उसका शमित हो जाना | जहाँ आग लगी हुई है उसका बुझ जाना, बहुत महत्वपूर्ण सूत्र है जो ऋषि नें हमें दे दिया है दो ही शब्दों में, स्वरुप निर्वाणं | जो कुछ भी तुम्हारे जीवन में जलता हुआ प्रतीत होता है वो तुम्हारा स्वरुप है | तुम ही हो जो जल रहे हो | वो सबकुछ जो तुम अपनें आप को समझते हो वही वो आग है जो…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org