मैंने बहुत घिनौने काम किए हैं, मेरा कुछ हो सकता है?

जीसस कह गए हैं कि “सफरिंग इज़ सिन (दुःख पाप है)”। जो भी कोई पीड़ा में है, दर्द में है, दुःख में कराह रहा है, उसने कहीं-ना-कहीं तो पाप कर ही रखा है। सनातन परंपरा के ग्रंथ जगह-जगह पर कहते हैं कि जो मुक्त होते हैं वो दोबारा जन्म नहीं लेते। जिनकी ज़िन्दगी में कोई कमी रह गई होती है, जो कामनाओं के जाल में रह गए होते हैं, उन्हीं को मनुष्य की देह धारण करनी पड़ती है। तो पापी तो हम हैं ही। बस अंतर ये है कि कुछ…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org