मेरी मर्ज़ी मैं कुछ भी करूँ

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इंसान में इतना आजकल अपने आप को प्रूव (साबित) करने का इतना जोश क्यों होता है, कि दुनिया को प्रूव करके दिखाना है कुछ? मतलब जैसे आजकल टीवी पर भी देखते हैं, तो मैं एक शो में गया था; उसका ऑडिशन देने गया था, एम.टीवी पर आता है, रोड़ीज़, उसमें पूछता है, “आप क्यों बनना चाहते हो?” आजकल नौजवान पीढ़ी सब बहुत देखते हैं ये एम.टीवी या ये। “तो क्यों बनना चाहते हो?” वहाँ लोग कहते हैं, “मुझे दुनिया को प्रूव करना है, सोसाइटी (समाज) को प्रूव करना है, ये करना है।” तो क्यों इतना होता है कि प्रूव करना है? कोई आपको कह दे कि, “तू छोटा है, तू नहीं कर सकता!” तो इतना गुस्सा आता है कि, “हाँ भाई तेरे को दिखा दूँगा!”

आचार्य प्रशांत: ज़ाहिर तो है न! जब तुमको खुद विश्वाश नहीं है अपने ऊपर, तो तुम चाहते हो कि दूसरे तुमको विश्वास दिलाएँ कि तुम ठीक हो। तुम्हें खुद पता हो कि तुम ठीक हो या ऊँचे हो या पूरे हो या मस्त हो, सुंदर हो, तो तुम दूसरों से नहीं जाओगे न सत्यापन माँगने, वैलीडेशन (सत्यापन) नहीं माँगोगे न फिर? पर खुद ही अंदर एक खोखलापन है तो जा-जाकर के दूसरों से चाहते हो कि वैलिडेशन मिल जाए, कि कोई दूसरा बोल दे कि “हाँ, हाँ बड़े अच्छे हो, बड़े प्यारे हो, वाह साहब आप तो शानदार हो, आपका जवाब नहीं।“ हकीक़त क्या है? तुम्हें अंदर-ही-अंदर पता है कि तुम एक नंबर के घोंचू हो। जो जितना घोंचू होगा, उसे उतना ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी दूसरों से तारीफ़ पाने की, कि दूसरे मुझे प्रूफ कर दें या अप्रूव (अनुमोदित) कर दें; जो भी।

एकदम सीधी सी बात नहीं है? अगर मुझे पता है मैं ठीक हूँ, पूरा भरोसा है, तो मैं इधर-उधर जा करके दूसरों से गवाही थोड़े ही माँगूँगा, कि, “तुम आओ मेरे पक्ष में खड़े हो जाओ, समर्थन कर दो, या “व्हाट डू यू थिंक अबाउट इट? (तुम इस बारे में क्या सोचते हो?)” पर हमारी विडंबना ये है कि जो ज़िंदगी के हमारे एकदम मूल, हार्दिक, कोर मसले होते हैं, हमें उनमें भी अपना कुछ पता नहीं होता तो वो चीज़ें भी हम दूसरों से पूछ रहे होते हैं।

“भाई-भाई, ये-ये इस बंदी से आजकल चल रहा है मेरा।” यंग (जवान) लोगों की बात कर रहे हो न! उनकी भाषा में; इनका चल रहा है। “ये तेरे को कैसी लगती है? ठीक लग रही है।” और चार ने अगर बोल दिया कि भाई माल मस्त है। इसी भाषा में बात होती है बिलकुल यही है; भाई माल मस्त है, तो इनको एकदम मज़ा आ जाएगा और ये कूद पड़ेंगे कि, “एकदम कुछ मैंने आज कुछ तीर ही मार दिया दुनिया में।”

ये इनके प्रेम की गुणवत्ता है, ये प्यार भी दूसरों को दिखाकर और दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं कि, “देखो मेरे साथ ये चल रही है आइटम।” बंदियों का भी ऐसे ही होगा; उनका भी कि “देखो ये वाला है; बहुत बढ़िया, सही चीज़ पकड़ी है, मोटा असामी है।”

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org