मा विद्विषावहै ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

मा विद्विषावहै ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

आचार्य प्रशांत: गुरु और शिष्य जब आमने-सामने बैठे हैं देह रूप में तो है तो दोनों जीव हीं। बस एक जीव है जिसकी चेतना ऊँचाई पा चुकी है और उन ऊँचाइयों से अपने द्वारा पाए गए अमृत को बिखेरना चाहती है, नीचे वालों पर उड़ेलना चाहती है ताकि जो नीचे हो वो भी ऊपर आ सके। चेतना की ऊँचाई की एक अनिवार्य निशानी होती है सद्भावना, करुणा, प्रेम। जो ऊँचा उठ गया उसके पास कोई विकल्प ही नहीं रह जाता; उसे नीचे की ओर हाथ बढ़ाना ही पड़ता है…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org