मारा एकमात्र कर्तव्य!

मारा एकमात्र कर्तव्य!

यस्वतंरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ।।१७।।

किन्तु जो लोग सत्य में ही अनुरक्त, तृप्त और संतुष्ट हैं उनके लिए तो कर्तव्य कर्म नहीं बचते।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, कर्मयोग, श्लोक १७

आचार्य प्रशांत: सुंदर बात कही है! पिछला श्लोक समाप्त हुआ था ये कहने पर कि जो लोग कामनाओं के ही पीछे भागते हैं, वो अपना जीवन व्यर्थ गँवाते हैं।…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org