माया क्या है?

आचार्य प्रशांत: आगे पूछा है कि, “माया क्या है?” माया क्या है; जितना कहा जाए कम है। इस बीच दो और व्याख्याएँ ऐसी आई हैं जो प्रश्नों में नहीं हैं पर महत्वपूर्ण हैं, तो उनकी चर्चा करेंगे।

एक है 'लिंग शरीर'। लिंग शरीर क्या है? ऋषि समझाते हैं कि,

“आत्मा की जो मायावी ग्रंथि है अनात्मा से, उसे कहते हैं हृदय-ग्रंथि, और उस ग्रंथि के कारण जो परिणाम उत्पन्न होता है उसको कहते हैं लिंग शरीर।“ वास्तव में जो आपका मानसिक जगत है, जो आपका सूक्ष्म शरीर है वही कहलाता है लिंग-शरीर। उपनिषद् को उद्धृत किए देते हैं- “मन आदि जो सूक्ष्म तत्व हैं, इनकी उपाधि सदैव आत्मा के साथ प्रतीत होती है, जिसे लिंग शरीर कहते हैं, वही हृदय की ग्रंथि है।“
-(सर्वसार उपनिषद्, श्लोक ७)

हृदय की ग्रंथि की चर्चा रमण महर्षि अक्सर किया करते थे। समझ में आ रही है बात?

हृदय की ग्रंथि कौन-सी ग्रंथि है? जहाँ पर सत्य से संसार उद्भूत हो जाता है। लोग पूछते हैं न, कि निराकार से साकार और निर्गुण से सगुण आ कैसे गया? तो उसी को दर्शाने के लिए हृदय ग्रंथि का सिद्धान्त दिया गया है। एक ग्रंथि है, जैसे एक गाँठ है, जहाँ जो निर्गुण है माने जो प्रकृति के पार है, वो सगुण से मिलता है। सगुण माने जिसमें प्रकृति के गुण आ गए। और जिस बिन्दु पर ये मिलन होता है, जहाँ गाँठ लगती है इन दोनों में, ग्रंथि माने गाँठ, जहाँ गाँठ लगती है इन दोनों में, दो अलग-अलग चीज़ों को गाँठ लगाकर बाँधा जाता है ना-उसको कहते हैं हृदय ग्रंथि।

और उस ग्रंथि के फलस्वरूप जो शरीर उत्पन्न होता है उसी को कहते हैं लिंग शरीर। तो लिंग शरीर आपका सूक्ष्म शरीर है, मन आदि। और फिर उस मन से आगे पूरे संसार का, जीव का, शरीर का सबका प्रक्षेपण हो जाता है।

इसी तरीके से एक और; जब ‘तत् त्वम् असि' बात हो रही है, “तत् त्वम् असि, श्वेतकेतु!” तो वहाँ पर शुद्धता को ध्यान में रखते हुए उपनिषद् के ऋषि हमें एक बात और स्पष्ट कर देते हैं। देखिए सत्य शुद्ध है, इसीलिए सत्य से संबंधित जितने वक्तव्य भी उपनिषदों में हैं उनमें शुद्धता का बहुत ध्यान रखा गया है। इसीलिए एक ही बात को बहुत-बहुत तरीकों से दोहराकर और भाँति-भाँति के उदाहरणों से समझाया गया है, ताकि आप उन बातों में अपनी ओर से कोई मेल-मिलावट, मिश्रण ना कर लें।

तो इसी तरीके से एक बार कह दिया कि 'तत् त्वम् असि' में 'तत्' परमात्मा है और 'त्वम्' प्रत्यगात्मा है, तो आगे बात को शुद्ध रखने के लिए एक चीज़ और जोड़ी; कहा कि, “सुनो! जो परब्रहम है उसके लिए कोई शब्द नहीं हो सकता, तो तुम उस तत् को भी आखिरी मत जान लेना,” क्योंकि हम ‘तत्’ को ब्रह्म ही समझते हैं। तो कहा, “लेकिन अब ये तो वो ब्रह्म हो गया ना जिसको तुमने नाम दे दिया? चूँकि इसको नाम दे दिया, तो इसके लिए इससे आगे भी कुछ होगा।“

जो भी चीज़ अब नामयुक्त हो गई, वो चीज़ अब उपाधियुक्त हो गई, वो चीज़ अब मानसिक हो गई…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org