माँसाहार का समर्थन — मूर्खता या बेईमानी? (भाग-1)

प्रश्नकर्ता १: मेरा ऐसा तर्क है कि माँसाहार शाकाहार दोनों ही प्रकृति के संतुलन हेतु आवश्यक हैं। आप कल्पना करें कि यदि पूरी मानव जाति शाकाहारी हो गई तो पानी में मछलियाँ कितनी ज़्यादा हो जाएँगी? और गाँव शहर में सूअर, बकरे-बकरी कितने ज़्यादा हो जाएँगे? कल्पना करना मुश्किल है।

प्रश्नकर्ता २: प्रकृति के चक्र का यह हिस्सा है कि हम जानवरों को मारें और आप कहते हैं कि क्लाइमेट चेंज का मुख्य…

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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