माँग के तो देखो

“Ask and it shall be given to you, seek and you shall find, knock and it shall open unto you, For everyone who asks receives; he who seeks finds; and to him who knocks, the door will be opened।।।“

Mathew (7:7)

मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।

क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।

मैथ्यू (7:7)

आचार्य पाशंत: तो बात सिर्फ तुम्हारी मर्ज़ी की है, जिन खोजा तिन पाईया। ये नहीं कहा गया है कि जिन खोजा, उनमे से कुछ लोगों ने पाया। ‘जिन खोजा तिन पाया’, बात सीधी है- खोजो और पाओ। असफलता का कोई प्रश्न ही नहीं है। मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा ठुकराए जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है। खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा दरवाज़े के बंद रह जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है। सारी बात तुम्हारी मर्ज़ी की है।

कल संध्या से बात हो रही थी तो मुझसे कह रही थी कि “पता है लेकिन पता रहते हुए भी ध्यान के कुछ क्षण ही उपलब्ध हो पाते हैं, और फिर मन इधर-उधर चला जाता है, और तमाम चीज़ें हैं जो हावी हो जाती हैं, महत्वपूर्ण लगने लगती हैं।” तो यही कहा उनसे कि आपको वास्तव में जब उनकी आकाँक्षा होगी, मिल जाएगा, क्योंकि तब आप उसका महत्त्व समझोगे, उसे प्रथम वरीयता दोगे, और दिलोजान से उसको माँगोगे। जब उसे पहली वरीयता दी जाती है, जब उसे सर्वोच्च पायदान पर रखा जाता है, जब कहा जाता है कि ये नहीं तो कुछ नहीं। “एक तू ना मिला, सारी दुनिया मिली भी तो क्या है?” जब मन स्पष्टतः इस बात को अनुभव करने लगता है, तब दरवाज़ा खुल गया। तुमने पूरी शिद्दत से अभी खटखटाया कहाँ?

और पूरी शिद्दत से खटखटाने का मतलब ये मत समझ लेना कि उसमे कोई बहुत श्रम लगता है, पूरी शिद्दत से खटखटाने का मतलब इतना ही है, साफ़ मन से खटखटाना। उसका मतलब ये नहीं है के लाठी डंडा ले कर के उस पर पिल पड़े हो दरवाज़े पर कि तोड़ ही देंगे। हमसे जब कहा जाता है कि दिलो जान से कोई काम करो तो ऐसी ही हमारी कुछ मानसिकता है कि हम उसका मतलब ये समझते हैं कि हथौड़ा और क्रेन, और बलप्रयोग, इसी तरह की छवियाँ मन में उठती हैं। नहीं, ये बात नहीं हो रही है।

मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगामाँगों तो। व्यापार नहीं करो, माँगो। और माँगने का अर्थ जानते हो क्या होता है? पूर्ण समर्पण। हमें माँगना आता नहीं। याद करो आखिरी बार तुमने कब किसी से वास्तव में माँगा था? तुम्हें तो जब माँगना भी होता है, तो तुम तो यूँ दिखाते हो जैसे बदले में कुछ दे सकते हो। एक भिखारी भी तुम्हारी गाड़ी के पास आता है चौराहे पर तो कहता है, “पैसा देदो, दुआएँ ले लो।” वो ये नहीं कहता कि मांग रहा हूँ, वो कहता है, “व्यापार कर रहा हूँ।” तुम एक पैसा दोगे, वो दस लाख देगा। तुम मुझे दे नहीं रहे हो, तुम अपना ही भला कर रहे हो, एक पैसा दो, दस लाख…

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org