मन पर चलना आज़ादी नहीं

दो तरह की गुलामी होती हैं।

एक गुलामी होती है, बड़ी सीधी। वो ये होती है कि कोई तुमसे कहे कि — “चलो ऐसा करो।”

“चलो, ऐसा करो” — ये गुलामी मुझे साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है, कि मुझे कहा गया तो मैंने किया। पर ये गुलामी बहुत दिनों तक चलेगी नहीं। क्यों? क्योंकि दिख रही है साफ़-साफ़ कि कोई मुझ पर हावी हो रहा है। तो तुम्हें बुरा लगेगा, और तुम बचकर चले जाओगे।

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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