मन गलत दिशा में क्यों भागता है?

यदि मन को साफ़-साफ़ पता ही हो कि कुछ गलत है तो उधर जाएगा नहीं। मन उधर को ही जाता है जिसके सही होने की तुमने उसे गहरी शिक्षा दे रखी होती है।

पहले तो इस यकीन को, इस मान्यता को निकाल दो मन से कि मन गलत तरफ की ओर आकर्षित होता है। मन गलत की ओर आकर्षित नहीं होता। मन उधर को ही जाता है जिधर जाने में सुख है। ये तुमने उसे बता रखा है।

मन का अपना कुछ होता नहीं। मन तो एक खाली जगह होती है जिसमें वही सब भर जाता है जो तुम भरने देते हो। मन एक खाली डब्बे की तरह है या एक खाली कंप्यूटर की तरह है। उसमें सॉफ्टवेयर तुम डालते हो।

मन को पूरी ट्रेनिंग तुम देते हो। मन में सारे संस्कार, कंडीशनिंग तुम भरते हो। अब दिक्कत ये आती है कि तुम्हीं ने वो संस्कार उसमें भरे, और एक दूसरे मौके पर तुम देखते हो कि ये संस्कार तुम्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं। तुम कहते हो कि ये तो गलत दिशा है।

तुम सड़क पर निकलते हो, तुम देखते हो किसी नेता का काफिला चला जा रहा है, वहाँ साथ में हथियारबंद लोग है, तुम कहते हो कि यही जीवन का परम उत्कर्ष है। ये मिल जाए तो इससे ऊँचा कुछ नहीं हो सकता।

अब अगर तुम किताब पढ़ रहे हो और उसी तरह का दृश्य आने लग जाए रेडियो में, टी.वी. में या सामने अखबार में दिख जाए या इंटरनेट में दिखने लगे और तुम्हारा मन उधर को ही भागे, तो अब उसमें क्या आश्चर्य है?

तो जो लोग चाहते हैं कि मन उनके साथ रहे, उन्हें मन की पूरी शिक्षा ही बदलनी पड़ेगी।

मन के ये जो गहरे संस्कार हैं, इनको बदलना पड़ेगा। तुमने झूठी बातों को अपने मन में महत्व दे रखा है। और जब तक मन में उन्हीं को महत्व दिए रहोगे, तब तक जीवन वैसा ही चलेगा जैसा चल रहा है, बिखरा-बिखरा सा।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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